रविवार, 1 मई 2016

आधुनिक वैज्ञानिक भौतिकवाद और पुरातन मिथ -इतिहास एक दूजे के अन्योन्याश्रित हैं।

प्रायः देखा गया है कि पूँजीवादी - टटपूंजिया -दक्षिणपंथी भाववादी लेखक- पत्रकार और नेता अक्सर साम्यवाद अर्थात मार्क्सवाद पर अक्सर  हमला करते रहते हैं। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तातपर्य यह नहीं कि  कमजोर वर्गों की आवाज को दबाएँ, और भृष्ट लुटेरों की चरण वंदना करते रहें ! प्रायः यह भी  देखा गया है कि जो शख्स वामपंथ या कम्युनिज्म की निंदा -आलोचना करता है, वह कार्ल मार्क्स  की शिक्षाओं और उनके द्वारा अन्वेषित  दवन्दात्मक भौतिकवाद का ककहरा भी नहीं जानता । इस तरह का धुर लम्पट- साम्प्रदायिक अथवा टुटपुँजिया व्यक्ति एक ओर तो बड़ी शिद्द्त से दावा करता है कि "दुनिया में कम्युनिज्म खत्म हो रहा है, और भारत में कम्युनिज्म की कोई सम्भावना ही नहीं है ,बगैरह,,,बगैरह,,,," दूसरी ओर वह जेएनयू जैसे तमाम विश्वविद्यालयों  के सभ्य सुशिक्षित -प्रगतिशील  प्रोफेसरों और छात्रों को जन्मजात  वामपंथी ही मान रहा है।  जिन्हे वर्तमान कारपोरेट कम्पनी कल्चर का पीलिया रोग हो चुका है ,ऐसे  लम्पट  युवाओं को जेएनयू का छात्र नेता कन्हैया कुमार  देशद्रोही नजर आता है। क्या  इन अर्धविक्षिप्त  युवाओं को  विजय माल्या ,ललित मोदी , जैसे  कालेधन वाले  भॄस्ट अफसर और  बेईमान पूँजीपति   देशभक्त नजर आते हैं ? वाह क्या अदा है ? संघ की नजर में कामरेड कन्हैया  देशद्रोही है और व्यापम काण्ड  वाले या भगोड़े  विजय माल्या जैसे लोग देशभक्त हैं।

अक्सर कुछ सीधे सादे अर्ध शिक्षित कैरियरिस्ट युवा- छात्र  किसी जुमलेबाज नेता की झांसेबाजी को ठीक से समझ  नहीं पाते। उन्हें नहीं मालूम कि एक  खास निहित स्वार्थी योजना के तहत  पूँजीवादी मीडिया  द्वारा एक खास रंग की राजनीती को  हिन्दू युवाओं के  ललाट पर उत्कीर्ण किया जा रहा है। कुछ  खास प्रतिगामी नीतियों को इतिहास के कूड़े से उठाकर महिमा मण्डित किया जा रहा है। सिर्फ एक खास नेता का ही गुणगान प्रायोजित किया जा रहा है। कोशिश की जा रही  है कि  सिर्फ एक के 'मन की बात ' ही सुनी जाए। क्या यह नव  - फासीवाद का आगाज नहीं है ? देश में यदि लोकतंत्र है तो सभी के मन की बात सुनी जानी चाहिए

आधुनिक युवा  तकनीकी रूप से और बिजनेस मैनेजमेंट या बाजारीकरण की नजर में तो काबिलियत रखते हैं किन्तु उन्हें विश्व व्यापी सनातन संघर्षों और उनके ऐतिहासिक दवंदों की खबर नहीं है। वे यह नहीं जानते कि आधुनिक साइंस ने दुनिया में केवल वैज्ञानिक क्रांति ही नहीं की है । बल्कि यूरोपियन  रेनेसा,फ्रेंच रेवोलुशन , अमेरिकी क्रांति , सोवियत अक्टूबर क्रांति ,चीनी सर्वहारा क्रांति के विश्व व्यापी असर की उन्हें कोई जानकारी  नहीं है । आधुनिक तकनीकी दक्षता प्राप्त युवाओं को नहीं मालूम कि यह आधुनिक  संचार क्रांति या वैज्ञानिक समग्र क्रांति जिस साइंस की देंन  है । उसी  साइंस ने दुनिया में  सामंतवादी- शोषणकारी  राजनीति को पलटने का  काम  भी किया  है। विश्व व्यापी साइंस की खोजों ने ही यूरोप में पहले -पहले पूंजीवाद पर प्रजातंत्र को बढ़त दिलाई। और 'चर्च' की प्रभुसत्ता को नियंत्रित  करने  का काम  भी किया। दुनिया बाहर के गुलाम राष्ट्रों-पूर्व के  उपनिवेशों को मुक्त कराने में इस साइंस की भूमिका प्रमुख रही है। साइंस ने राजनैतिक -आर्थिक -सामाजिक  क्षेत्र में जो भी  क्रांतिकारी उलटफेर किये हैं ,वे ही  मार्क्सवाद या साम्यवाद के उत्प्रेरक हैं। इसी समग्र वैश्विक  क्रांतिकारी दर्शन ने  दुनिया  को क्रांति की नयी राह दिखाई है । वैज्ञानिक  भौतिकवाद ही साम्यवादी  दर्शन का मेरुदण्ड है। आधुनिक मोबाइल धारक युवाओं को यह ज्ञान भी  होना चाहिए। 

मार्क्स ,एंगेल्स तो साम्य वादी अन्वेषण के  महज निमित्त मात्र थे। यह व्यवस्था परिवर्तन का सिद्धांत अटल है ,यह हर देश में हर काल में अलग-अलग ढंग से होता ही रहता है। वक्त आने पर  भारत में भी इसे  होना ही है। लेकिन किस देश में -कब होगा - कैसे होगा ? यह उस देश के युवाओं की तासीर पर निर्भर है । क्रांति कब हो - कैसे  हो ? यह सम्बंधित देश की युवा सोच पर निर्भर है। क्रांति की प्रक्रिया को जान लेना ही मार्क्सवादी दर्शन का वैदिक  ब्रह्मज्ञान है। भारत में यह ज्ञान सर्वप्रथम मान्वेंद्रनाथ राय ,रजनिपामदत्त ,लोकमान्य  तिलक  , मुजफ्फर अहमद , शहीद भगतसिंह इत्यादि महान  क्रांतिकारियों  को  हुआ था। उन्होंने भारत में वोल्शिविक क्रांति के सपने देखे थे। किन्तु धूर्त अंग्रेजों ने भारत में जाति -धर्म के आधार पर एक से अधिक 'राष्ट्रीयताओं'को पॉपुलर किया। ताकि भारत में सर्वहारा क्रांति को रोक जा सके।  इसीलिये उन्होंने गांधी जी के 'अहिंसा' सिद्धांत को सराहा।  और और कांग्रेस -मुस्लिम लीग के  अलगाववाद को खास तवज्जो दी।

अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग व जिन्ना को पाकिस्तान के लिए उकसाया। सिखों को खालिस्तान के लिए उकसाया। तमिलों -तेलगु और अन्य गैर हिंदी -भाषा -भाषियों को उनके अलग-अलग राष्ट्रों के लिए उकसाया। अंग्रेजों ने ही दलितों और उनके नेताओं को जातीय आधार पर पृथक निर्वाचन के लिए उकसाया। जिसे महात्मा गांधी ने बड़ी सूझ-बूझ और मेहनत  से  'पूना पेक्ट ' के तहत आरक्षण व्यवस्था के रूप में लागू करवाया ।यदि आज गांधी जी और बाबा साहिब अम्बेडकर होते तो पटेलों-जाटों के तेवर देखकर अपना माथा कूट लेते।

 अंग्रेजों ने जाते-जाते ,कश्मीर,हैदराबाद,भोपाल,जूनागढ़ और अन्य कई राजाओं को 'भारत संघ' में शामिल होने से रोका।  उन्होंने उन्हें  देशी राजाओं को स्वतंत्र रहने के लिए उकसाया !इस अवसर पर कांग्रेस के अंदर जो अधिकांश लेफ्टिस्ट  ही थे उन्होंने भारत को एकजुट करने में सरदार पटेल और नेहरू का भरपूर साथ दिया। देश विभाजन के समय  हैदराबाद  के निजाम और उसके रजाकरों ने रॉयल सीमा औरआंध्र में  जितने कम्युनिस्ट मरवाए उतने तो पाकिस्तान में हिन्दू भी नहीं मारे गए होंगे।  ठीक इसी समय हिन्दू महा सभा के लोग भारत में धर्मनिरपेक्षता के नाम  पर गांधी जी को  निपटाने के षड्यंत्र रच रहे थे। जिसकी परिणीति नाथूराम गोडसे के हाथों गांधी जी की हत्या के रूप में हुई।

अच्छे -खासे पढ़े लिखे लोग भी कभी-कभी आर्थिक -राजनैतिक-दर्शन -सिद्धांतों को जाने बिना घोर फासीवादी संगठनों के प्रभाव में आ जाते हैं। इसी तरह राजनीतिक विश्लेषण क्षमता से विमुख कुछ प्रगतिशील लोग भी धर्मनिरपेक्षता और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भटक जाया करते हैं।  दक्षिणपंथी संकीर्णतावाद के प्रतिबिम्ब जैसे ही कुछ  वामपंथी भी वैचारिक  संकीर्णतावाद की खाई में जा गिरते हैं। पर्याप्त अध्यन के अभाव में संघ परिवार का बड़े से बड़ा प्रवक्ता भी मार्क्सवादी  नीति निदेशक सिद्धांतों से  अंजान ही रहता है। क्योंकि वह मार्क्सवाद  के प्रति सहज ही नकारात्मक भाव में होता है, इसलिए उससे किसी किस्म के विवेकपूर्ण विश्लेषण की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसी तरह अधिकांश मार्क्सवादी भी सर्वहारा -अंतर्राष्ट्रीयतावाद के प्रचण्ड चेता तो हो सकते हैं किन्तु उन्हें भावजगत  दर्शन के अध्यन में कोई रूचि नहीं होती। वे गीता-रामायण ,बाइबिल.कुरआन इत्यादि जैसे भाववादी साहित्य को समग्र रूप से पढ़ने -समझने की कोई खास चेष्टा नहीं करते। चूँकि  उन्होंने पहले से ही ठान रखा है कि  ''यह  सब बकवास है , पाखंडपूर्ण मिथकीय कूड़ा करकट है '' ! इसी तरह अन्य मजहबी ग्रंथों को पढ़े बिना  या  ठीक से जाने बिना उसके विमर्श में उलझकर ये लोग फिसड्डी सावित होते  रहते हैं।

इसीलिये संसदीय लोकतंत्र के त्रुटिपूर्ण चुनावों में असंगठित क्षेत्र की  बहुसंखयक जनता और अल्पसंख्य्क समूह तीसरे विकल्प या वामपंथ  की जीत को  संदेह की नजर से देखती है। लोक सभा या विधान सभा चुनावों के समय  गरीब- मजदूर-किसान जाति -धर्म -मजहब के पांतों में बट जाता है। और गफलत में अपने वर्ग शत्रु को ही वोट दे देता है। और  उसकी रहनुमाई के लिए तैयार सर्वहारा के हरावल दस्ते को हार का मुँह देखना पड़ता  है। अच्छे दिनों के भारत में यही सब चल  रहा है।मानव इतिहास के हर एक दौर में कुछ मुठ्ठी भर लोग  ही होते रहे हैं जो  हर किस्म के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ संगठित संघर्ष की रहनुमाई  किया करते रहे हैं। वे समाज और राष्ट्र के  सकारात्मक निर्माण में भी निष्णांत हुआ करते  हैं। ऐंसे उदात्त चरित्र के बलिदानी लोगों से ही  महाकाव्यों के धीरोदात्त चरित्र गढे  जाते रहे हैं। कालांतर में ,इन्हे ही देव ,इन्हें ही अवतारा ,इनको ही 'नायक' कहा जाता है। आधुनिक वैज्ञानिक भौतिकवाद और पुरातन मिथ -इतिहास एक दूजे के अन्योन्याश्रित हैं।

 आधुनिक विश्व क्रांतिकारी द्वन्दात्मक -भौतिकवादी विचार के प्रणेताओं ने उनके प्रगतिशील वामपंथी-साहित्य को जो   सम्मान दिया है ,वही  सम्मान  सामन्तयुगींन रीतिकालीन सौंदर्य साहित्य को भी सम्मान मिलना चाहिए। यह साम्यवादी दर्शन उतना ही पुरातन  है जितने की महाकाव्य। इसलिए दोनों ही समान रूप  से आदरणीय ,पठनीय और अवलोकनीय  है। भाववादी  महाकाव्य  साहित्य सृजन  न केवल भव्य  है अपितु निरंतर अध्यन  योग्य  भी है।  उसका अनुशीलन  प्रतिक्रांतिकारी नहीं  है अपितु किसी भी क्रांति चेतना के लिए यह जीवंत साहित्य की तरह  ही सर्वकालिक है। स्वामी विवेकानंद ,स्वामी श्रद्धानन्द,लाला लाजपत राय , काजी नजरूल इस्लाम ,रवींद्रनाथ टेगोर,अरविंदो ,ईएमएस नम्बूदरीपाद ,श्रीपाद डांगे इत्यादि ने भारतीय  महाकाव्यों का गहन अध्यन  किया था। इन सभी को यूरोप की वैज्ञानिक और भौतिक क्रांतियों का भी पर्याप्त  ज्ञान था। यही वजह है कि निर्विवाद रूप से  ये सभी  स्वतंत्र भारत के पथप्रदर्शक माने जाते हैं। वैसे भी  कुछ अपवादों  - क्षेपकों को छोड़कर अधिकांश भाववादी भारतीय साहित्य -खास तौर से पाली,प्राकृत ,अपभ्रंस ,संस्कृत -वांग्मय एवं  दर्शन अक्षरशः वैज्ञानिक आधार पर भी पर्याप्त अनुकरणीय है। मानवीय तो वह है ही ।भले ही यह  तमाम प्राचीन महाकाव्य सृजन नितांत अतिश्योक्तिपूर्ण  गप्पों का ही भण्डार ही  क्यों न हो किन्तु बन्धुता, परोपकार -न्यायप्रियता ,अपरिग्रह, उत्सर्ग ,सत्य -शील सृजन और  अन्य सनातन मूल्यों की अमूल्य धरोहरके रूप में ये  'कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो' के सिद्धांतों जैसे ही सर्वकालिक हैं।

महाभारत और उसके भीष्म पर्व में सन्निहित भगवद्गीता तो विश्व में बेजोड़ हैं। कुछ प्रगतिशील लोग इस मिथकीय साहित्य को बिना पढ़े ही हेय दॄष्टि से देखते हैं। इसी तरह अधिकांश  भाववादी और अंधश्रद्धा वाले मजहबी साम्प्रदायिक लोग भी 'दास केपिटल ' मार्क्सवाद या 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो'  इत्यादि को पढ़े बिना ही कम्युनिज्म पर टीका टिप्पणी करते रहते हैं। ये तथाकथित धार्मिक और भाववादी लोग अपने धर्म -पंथ के मूल्यों को जाने बिना और  इन गर्न्थो का सांगोपांग अध्यन किये  बिना ही उन की गलत सलत व्याख्या करते रहते हैं। वे अपने धार्मिक प्रयोजन के बहाने  इस शानदार पुरातन धरोहर रुपी अध्यात्म साहित्य को कर्म-कांड  धर्म-मजहब के बहाने  उसका बेजा दुरूपयोग करते रहते हैं।

वेशक वेद ,आरण्यक ,गीता इत्यादि ग्रन्थ  भी मूलतः भौतिकतावादी ही हैं। इनमें निहित भाववाद सिर्फ व्यष्टि चेतना के निमित्त ही है। सिर्फ रामायण महाभारत या अभिज्ञान शाकुन्तलम ही नहीं बल्कि पंचतंत्र-हितोपदेश जैसा लोक  साहित्य  भी केवल मिथ या कालकवलित सृजन नहीं है।  अजन्ता ,एलोरा ,खजुराहो,साँची -सारनाथ और  विशाल भारत में यत्र-तत्र -सर्वत्र विखरी पडी  विराट पुरातन  शिल्प  धरोहर में कुछ भी अवैज्ञानिक नहीं है। बिना  गणतीय सूत्रों ,प्रमेयों और भौतिक ज्ञान  के अतीत का यह सृजन सम्भव  भी नहीं था । अतः यह  पुरातन शिल्प ,पौराणिक -मिथकीय सृजन और साहित्य भी आधुनिक प्रगतिशील वैज्ञानिक खोजों की ही तरह न केवल ज्ञेय  और गम्य है बल्कि  सार्वदेशिक और सार्वकालिक  हैं।


  श्रीराम तिवारी !

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