यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य की ' विचार शक्ति' की महत्ता सर्वोपरि है। इसके दुरूपयोग से यदि इंसान हैवान या शैतान बन सकता है ,तो इसके सदुपयोग से इंसान दुनिया में इंसानियत का झंडा बुलंद कर सकता है। निसन्देह इस तथ्य की वैज्ञानिक स्थापना का श्रेय वैदिक मन्त्र दृष्टा ऋषियों को ही जाता है। सबसे पहले इन्होंने ही यह जाना कि मनुष्य अपने अवचेतन मन की वृत्तियों को पुन्जीभूत करके अन्य प्राणियों पर काबू कर सकता है। भले ही इन ऋषियों ने 'विचार' और पदार्थ के उचित संयोग को 'यज्ञ'कहा हो,उससे उतपन्न ऊर्जा को दैवीय प्रसाद माना हो ,किन्तु यह परमसत्य है कि वैदिक ऋषियोंने ही सबसे पहले यह जानाकि वैचारिक ऊर्जा के द्वारा प्राकृतिक तत्वों के स्वभाव को और प्राणिमात्र के व्यवहार को बदला जा सकता है।आर्य ऋषियों की इन खोजों को यदि तत्तकालीन कबीलाई मानवीय जीवन की आचार संहिता से नत्थी करदें तो वह 'वैदिक धर्म'का आधार कहा जा सकता है। जिसे कुछ लोग 'हिन्दू धर्म' कहते हैं,वह किसी एक व्यक्ति का 'इल्हाम'या 'बोध'नहीं है।और यह किसी बर्बर कौम या यायावर कुटुंब-कबीले का हिंसक 'चाल -चरित-चेहरा' नहीं है।
वास्तव में यह तो एक सनातन परम्परा है। यह वैदिक दर्शन तो डार्विन के विकासवादी सिद्धान्त की तर्ज पर आर्यों - भारतीयों के वैज्ञानिक क्रमिक विकास को ही प्रस्तुत करता है। अद्वतीय वेदांत दर्शन के रूप में यह अन्य पंथ ,दर्शन,मजहब और आस्थाओं से अलहदा है। चूँकि यह क्रमिक विकास की लंबी परम्परा याने सनातन से है इसलिए इसे 'सनातन धर्म' कहा जाता है । मेरा दावा है कि यह सनातन धर्म एक अद्वतीय वैज्ञानिक जीवन दर्शन है।इसलिए यह न तो मार्क्स के शब्दों में 'अफीम 'है ,और न ही यह साम्यवाद के नजरिये से इसे अमानवीय कहा जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ तथाकथित अवैदिक मत-पन्थ -दर्शन भी केवल कुछ खास व्यक्तियों की निजी 'अहमन्यता ' का परिणाम हैं। इनमें से किसी ने कुछ भी नया नहीं कहा। नए धर्म, पन्थ-दर्शन के नाम पर मनुष्य मात्र के समक्ष जो कुछ परोसा गया वह केवल शब्दों की बाजीगरी मात्र है। वेदों या सनातन धर्म से बाहर जो कुछ भी कहा गया है ,वह सब वैदिक वाङ्गमय में पहले से ही मौजूद था। सम्भवतः आदि शंकराचार्य ने यही सिद्ध करके अपनी 'आध्यात्मिक दिग्विजय'के झंडे सारे भारतीय उपमहाद्वीप में गाड़े होंगे ।
चूँकि प्रकृति ,पदार्थ और चेतना के साहचर्य की महत्ता स्थापित करने वाले तथा प्रकृति को मनुष्य के अनुकूल बनाने वाले वैदिक मन्त्रों की सर्जना में कहीं कोई दैवीय चमत्कार नहीं है। वेदमंत्रों ,उपनिषद सूत्रों ,आरण्यक-श्लोकों ,ब्राह्मण संहिताओं में कहीं किसी तरह की कोई अंध आस्थाके निशान मौजूद नहीं हैं। चारों वेदों ,तमाम उपनिषदों और वेदांत दर्शन में कहीं भी अमानवीयता या अवैज्ञानिकता नहीं हैं। वैदिक वाङ्गमय में पाषणयुग से लेकर पूर्व वैदिक काल तक की हजारों साल की लंबी आध्यात्मिक यात्रा का क्रमिक विकास दृष्टव्य है। वेशक पुराणों में बहुत घपला है किन्तु वेदांत दर्शन में तो विशुद्ध मानवीय दर्शन और परा -मनोविज्ञान का ही पसारा है। मूलतः वेदांत दर्शन को ही समग्र हिन्दू धर्म का सारतत्व कहा जा सकता है। कालांतर में रघुवंश ,यदुवंश और कुरुवंश जैसे सामन्तों की कुलीनता ने भी मानवीय मूल्यों के झंडे गाड़े हैं। यदि हरिश्चंद्र-तारामती का यह सब मिथ है
इस प्रक्रिया का आस्तिकता या नास्तिकता से कोई वास्ता नहीं है ।धर्म-मजहब ,ईश्वर-आत्मा से भी इसका कोई सरोकार नहीं है। यह मानसिक संवेदनाओं की ऊर्जा का उत्सर्जन है। और उसकी मशक्क्त का बहिर्जगत में प्राकट्य है। प्रायः हर जागरूक मनुष्य यह जानता है कि यदि वह अपने विचारों के संकेद्रण पर ध्यान दे तो उसके विचार ही शब्द बन जाते हैं। मनुष्य यदि उन शब्दों पर ध्यान दे तो वे कर्म बन सकते हैं। याने कर्म का कारण शब्द है और शब्द का कारण 'विचार' है और 'विचार'का कारण मानव मस्तिष्क है। विचार शक्ति से ही दुनिया में वैज्ञानिक क्रांति हुई है। विचार शक्ति से ही राजनैतिक -सामाजिक -सांस्कृतिक क्रांतियाँ सम्पन्न हुईं हैं। तमाम जेहादियों -धर्मांध पाखंडियोंने केवल और केवल भ्रान्तियाँ भी उतपन्न कीं हैं। हिन्दू धर्म कोई मत-पंथ या मजहब नहीं है बल्कि एक वैज्ञानिक जीवन दर्शन है अपौरुषेय है।
विचार शक्ति का सिद्धांत जब नकारात्मक संदर्भ में सही हो सकता है तो सकारात्मक अर्थ में सही क्यों नहीं होगा ? बीसवीं शताब्दी के नाजीवादी -फासीवादी हिटलर का मंत्री गोयबल्स कहा करता था कि एक झूंठ को बार-बार बोलो वह सच में परिणित हो सकता है ! भारत में भी कुछ लोग हिटलर के अनुयायी हैं , वे भी इस विचार शक्ति की नकारात्मक ऊर्जा का दुरूपयोग करते हुए राज्य सत्ता हासिल करने में कामयाब हो रहे हैं। लेकिन उनका विनाश सुनिश्चित है। अंततोगत्वा सामूहिक जन चेतना की विचार शक्ति ही सहिष्णु और धर्मनिरपेक्ष उदारवादी-जनवादी व्यवस्था के निमित्त मानवता का सिंहनाद करेगी।
जो लोग धर्मनिपेक्ष भारत ,समाजवादी भारत ,खुशहाल भारत ,मजबूत भारत चाहते हैं ,उन्हें भीड़तंत्र को लोकतंत्र नहीं मान लेना चाहिए ,बल्कि अपनी उत्कृष्ट विचार शक्ति की सामूहिक सकारात्मक ऊर्जा के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। इस विचार शक्ति को सिर्फ सार्वजानिक जीवन में ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत जीवन को भी सदुपयोग करके जीवन को कुछ हद तक खुशहाल बनाया जा सकता है। यकीन न हो तो एक प्रयोग करके देखें ! सुबह से दोपहर तक झूंठ-मूठ ही सही रोज खुश रहने का नाटक करें ,आप पाएंगे कि दोपहर बाद कोई आप को दुखी नहीं कर सकता ! श्रीराम तिवारी :-

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