मंगलवार, 10 मई 2016

मल्टीनेशनल के घोर समर्थक मोदी जी और जेटली जी पतंजलि का साथ कैसे देंगे ?




  लगभग ७-८ साल पहले जब पतंजलि ओषधि में मानव हड्डी पाई गई थी ,तबसे मैंने स्वामी रामदेव के खिलाफ खूब लिखा था। वह सिलसिला  अब  भी ज़ारी है। विगत  लोक सभा चुनावों के ठीक पहले स्वामी रामदेव का नेता नुमा  स्वांग रामलीला मैदान पर सबने देखा। रामदेव का अण्णा जैसा ही  धरना आंदोलन -ड्रामा और स्त्रीवेश में मैदान छोड़कर भागना उनके समर्थकों को भी पसंद नहीं आया। कालेधन और भृष्टाचार के खिुलाफ रामदेव लगातार १० साल से भाषणबाजी करते  रहे हैं। लेकिन जबसे एनडीए सरकार बनी और मोदी जी का राजतिलक हुआ है ,रामदेव जी कालेधन और भृष्टाचार के सवाल पर मुँह में दही जमाये बैठे हैं। ऐंसा आभासित होता है कि बाबा रामदेव को यह बृह्म ज्ञान हो गया है कि उनका योगबल रुपी  बृह्मबाण मोदी जी के काम आकर बेअसर हो चुका है। रामदेव के तरकश में अब पतंजलि संसथान का तीर ही शेष बचा है। इसलिए आजकल वे  पतंजलि के विज्ञापन  में जुट गए हैं। पतंजलि उत्पादों के विस्तार में भी  बाबा  जी जान से जुटे हैं। शायद उन्हें इल्हाम हो चुका है कि केवल  शारीरिक कौशल या कसरत से अपनी महिमा को अक्षुण नहीं रखा जा सकता ! देश की आवाम को सस्ते और  वैश्विक उत्पाद भी उपलब्ध कराने  होंगे।

हालाँकि मुझे उनके उत्पादों या उनके 'योग' से कोई लगाव नहीं है। जो योगासन रामदेव सिखाते हैं वे बचपन में हमारे गाँव के प्रायमरी स्कूल में सिखाए जाते थे। और जाहिर है कि  इस विषय  में हमारे गाँव के तत्कालीन युवा स्वामी रामदेव से ज्यादा आसन और पैंतरे जानते थे। चूँकि  मैंने स्वयं खेतों में नंगे पैर हल हाँका  है। नीलामी के जंगलों में लकड़ी  भी काटी  है। और  पढाई के दौर में सड़कों के लिए खन्तियां  भी खोदी हैं। पत्थर भी तोड़े हैं ।स्वामी  रामदेव  ने यह सब किया होगा इसमें संदेह है।  अब से ५०-६० साल पहले प्रायः हर गाँव -कस्बे में एक अदद अखाडा जरूर हुआ करता था। अब भी गाँवों कस्बों में कहीं-कहीं उनके चिन्ह बाकी हैं। जहाँ तक पतंजलि उत्पादों के सेवन और खरीदने का प्रश्न है तो मुझे पतंजलि के किसी उत्पाद में कोई रूचि नहीं। दरसल  मुझे उनके उत्पादों की जरुरत ही नहीं। वैसे भी हमने अपनी जरूरतों को सीमित कर रखा है। डाबर, हो या वैद्द्यनाथ या पतंजलि - आयुर्वेदिक ,हौम्योपैथिक दवाइयों पर मुझे कोई भरोसा नहीं। लेकिन जिन  मल्टीनेशनल कम्पनियों  के खिलाफ संघर्ष करते हुए  मेरी जिंदगी गुजर गयी ,यदि उन्हें  कोई वास्तव में  चुनौती दे रहा है  ,तो मेरा राष्ट्रीय  कर्तव्य है कि  मैं स्वामी रामदेव और पतंजलि का साथ दूँ !

चूँकि  मल्टीनेशनल कम्पनियों ने भारत का बाजार कैप्चर कर  रखा है और  पतंजलि उत्पाद मल्टीनेशनल  कम्पनियों के उत्पादों को चुनौती दे रहे हैं।  इसलिए  न चाहते हुए भी  मैं अब  बाबा के इस वैश्विक व्यापार का समर्थन करता हूँ।  बशर्ते स्वामी रामदेव और उनका पतंजलि संसथान अपने उत्पादों की मानक गुणवत्ता का नियमन करे। यदि स्वामी रामदेव और उनका पतंजलि योग संसथान भारतीय संविधान के दायरे में काम करे , यदि वे  कर्मचारियों,मजदूरों के वेतन ,भत्ते ,पीएफ ,चिकित्सा सुविधा और तद्नुरूप अवकाश के प्रावधानों का पालन करें  ,यदि स्वामी रामदेव और पतंजलि  किसी पूंजीवादी पार्टी को सत्ता में बिठाने का टूल्स न बने और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का आदर करें तो मल्टीनेशनल कम्पनीज बनाम पतंजलि की प्रतिस्पर्धा में मैं स्वामी रामदेव और पतंजलि का ही साथ दूंगा !  जिन्हे मालूम है कि स्वामी रामदेव और उनका पतंजलि अब एमएनसीज  के निशाने पर हैं।  जो भी  सच्चे क्रांतिकारी और वतनपरस्त हैं  वे भी रामदेव  और पतंजलि का साथ देंगे। जो भी  इस विमर्श में पतंजलि के खिलाफ होगा वो मल्टीनेशनल कम्पनियों का समर्थक माना जाएगा !  मल्टीनेशनल के हाथों लुटने से  बेहतर है बाबा रामदेव के हाथों लूट जाना। क्योंकि बाबा जो कमाएगा वह साथ नहीं ले जाएगा.। सब यहीं धरा रह जायेगा और देश के कम आयेगा !

 यह कबीले गौर हैं कि पतंजलि बनाम मल्टीनेशनल की प्रतिस्पर्धा में  मोदी सरकार का रुख कैसा रहेगा ? क्योंकि  मोदी जी और  जेटली जी  तो मल्टीनेशनल के  घोषित खासम खास हैं। वे पतंजलि का साथ कैसे देंगे ?  यदि वे स्वामी रामदेव का साथ देंगे तो मल्टीनेशनल कम्पनियों द्वारा  सत्ता से उखड दिए जाएंगे। और यदि स्वामी रामदेव का साथ नहीं देते तो बाबा के वोट बैंक से महरूम होना पडेगा !  उनके लिए इधर कुआँ  -उधर खाई है !

\श्रीराम तिवारी


हिंदुत्व वादी भारत के असल नारे-Dr S.N.Subbarav,,,[ Nayee Duniya se sabhaar]



आधुनिक युवाओं को डॉ एस एन सुब्बाराव के बारे में शायद ही  कुछ मालूम हो ,किन्तु सामाजिक कार्यकरताओं और अध्येता- प्रबुद्ध जनों को उनके बारे में बहुत कुछ मालूम है। डॉ सुब्बाराव वरिष्ठ गांधीवादी फिलॉस्फर और ख्यातनाम सामाजिक कार्यकर्ता हैं। प्रसिद्धि से दूर रहकर उन्होंने विगत शताब्दी के सातवें-आठवें दशक में चंबल के बीहड़ों को और बुंदेलखंड  के घने जंगलों को डाकुओं से मुक्त कराया था। तब  दुर्दांत डाकुओं के आतंक से आम जनता बहुत पीड़ित थी।डॉ सुब्बाराव ने उन खूँखार डाकुओं  का आत्म समर्पण करवाया। उन्होंने मध्यप्रदेश ,छ्ग यूपी और राजस्थान को डाकू समस्या से मुक्ति  दिलाई। वे महात्मा गाँधी की पत्नी कस्तूरबा गाँधी से संबंधित कार्यक्रम में शिरकत करने इंदौर आये । वे गांधी रिसर्च फाउंडेशन से भी वास्ता रखते हैं। इस अवसर पर इंदौर में पत्रकारों के सवालों का जबाब देते हुए डॉ सुब्बाराव ने अपने कुछ महत्वपूर्ण विचार रखे। धर्म-अध्यात्म और साइंस को लेकर उन्होंने अपनी  पृथक  परिभाषा प्रस्तुत की। वेशक जो लोग किसी खास विचारधारा को अंतिम सत्य मानते हैं ,वे  डॉ एस एन सुब्बाराव से शायद ही सहमत होंगे !

विज्ञान और साइंस की तुलना पर और भौतिकवादी बनाम अध्यात्मवादी दर्शन की तुलना पर डॉ सुब्बाराव ने फरमाया ''साइंस  और भौतिकवादी दर्शन की अपनी सीमाएँ हैं ,किन्तु अध्यात्म-दर्शन का दायरा बहुत  व्यापक है। दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन स्वयं कहा करते थे कि विज्ञान के जरिये बीमार मनुष्य को स्वस्थ तो किया जा सकता है ,किन्तु हम अभी तक कोई ऐंसा इन्जेकशन  नहीं बना सके जो  किसी बेईमान आदमी को ईमानदार बना दे ! इसके लिए तो हमें अध्यात्म के तहत  ही अनुसन्धान करना होगा ''

'भारत माता की जय ' और देशभक्ति बनाम देशद्रोह  के विमर्श को उन्होंने मीडिया प्रायोजित बताया। उन्होंने कहा ''साइंस ने दुनिया की भौगोलिक दूरी तो घटा दी किन्तु दिलों की दूरियाँ कम करने मे उसकी भूमिका क्या  है? '' ८८ साल के सीनियर गांधीवादी फिलॉस्फर एस एन  सुब्बाराव इस उम्र में  भी अपने तमाम काम खुद ही करते हैं।  अतयन्त प्रतिभावान -ऊर्जावान सुब्बाराव आगे कहते हैं ''वंदे  मातरम ,भारत माता की जय और अन्य  नारे तो गुलामी के दौर में कांग्रेस के अहिंसात्मक  हथियार हुआ करते थे। जबकि शहीद  भगतसिंह,  चन्द्रशेखर आजाद,सुखदेव ,राजगुरु और हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का नारा 'इंकलाब जिंदाबाद हुआ करता था। '' उन्होंने हिंदुत्ववादियों से  व्यंगात्मक लहजे में सवाल किया  कि वे  यदि वास्तव में हिन्दू हैं तो असल हिन्दू वादी  नारे क्यों नहीं लगाते ? जब किसी पत्रकार ने उनसे पूँछा  कि  हिंदुत्व वादी भारत के असल नारे क्या होने चाहिए ? डॉ सुब्बाराव ने कहा '' विश्व का कल्याण हो !जियो और जीने दो ! वसुधैव कुटुम्बकम !सत्य मेवजयते !
  श्रीराम तिवारी !

रविवार, 1 मई 2016

आधुनिक वैज्ञानिक भौतिकवाद और पुरातन मिथ -इतिहास एक दूजे के अन्योन्याश्रित हैं।

प्रायः देखा गया है कि पूँजीवादी - टटपूंजिया -दक्षिणपंथी भाववादी लेखक- पत्रकार और नेता अक्सर साम्यवाद अर्थात मार्क्सवाद पर अक्सर  हमला करते रहते हैं। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तातपर्य यह नहीं कि  कमजोर वर्गों की आवाज को दबाएँ, और भृष्ट लुटेरों की चरण वंदना करते रहें ! प्रायः यह भी  देखा गया है कि जो शख्स वामपंथ या कम्युनिज्म की निंदा -आलोचना करता है, वह कार्ल मार्क्स  की शिक्षाओं और उनके द्वारा अन्वेषित  दवन्दात्मक भौतिकवाद का ककहरा भी नहीं जानता । इस तरह का धुर लम्पट- साम्प्रदायिक अथवा टुटपुँजिया व्यक्ति एक ओर तो बड़ी शिद्द्त से दावा करता है कि "दुनिया में कम्युनिज्म खत्म हो रहा है, और भारत में कम्युनिज्म की कोई सम्भावना ही नहीं है ,बगैरह,,,बगैरह,,,," दूसरी ओर वह जेएनयू जैसे तमाम विश्वविद्यालयों  के सभ्य सुशिक्षित -प्रगतिशील  प्रोफेसरों और छात्रों को जन्मजात  वामपंथी ही मान रहा है।  जिन्हे वर्तमान कारपोरेट कम्पनी कल्चर का पीलिया रोग हो चुका है ,ऐसे  लम्पट  युवाओं को जेएनयू का छात्र नेता कन्हैया कुमार  देशद्रोही नजर आता है। क्या  इन अर्धविक्षिप्त  युवाओं को  विजय माल्या ,ललित मोदी , जैसे  कालेधन वाले  भॄस्ट अफसर और  बेईमान पूँजीपति   देशभक्त नजर आते हैं ? वाह क्या अदा है ? संघ की नजर में कामरेड कन्हैया  देशद्रोही है और व्यापम काण्ड  वाले या भगोड़े  विजय माल्या जैसे लोग देशभक्त हैं।

अक्सर कुछ सीधे सादे अर्ध शिक्षित कैरियरिस्ट युवा- छात्र  किसी जुमलेबाज नेता की झांसेबाजी को ठीक से समझ  नहीं पाते। उन्हें नहीं मालूम कि एक  खास निहित स्वार्थी योजना के तहत  पूँजीवादी मीडिया  द्वारा एक खास रंग की राजनीती को  हिन्दू युवाओं के  ललाट पर उत्कीर्ण किया जा रहा है। कुछ  खास प्रतिगामी नीतियों को इतिहास के कूड़े से उठाकर महिमा मण्डित किया जा रहा है। सिर्फ एक खास नेता का ही गुणगान प्रायोजित किया जा रहा है। कोशिश की जा रही  है कि  सिर्फ एक के 'मन की बात ' ही सुनी जाए। क्या यह नव  - फासीवाद का आगाज नहीं है ? देश में यदि लोकतंत्र है तो सभी के मन की बात सुनी जानी चाहिए

आधुनिक युवा  तकनीकी रूप से और बिजनेस मैनेजमेंट या बाजारीकरण की नजर में तो काबिलियत रखते हैं किन्तु उन्हें विश्व व्यापी सनातन संघर्षों और उनके ऐतिहासिक दवंदों की खबर नहीं है। वे यह नहीं जानते कि आधुनिक साइंस ने दुनिया में केवल वैज्ञानिक क्रांति ही नहीं की है । बल्कि यूरोपियन  रेनेसा,फ्रेंच रेवोलुशन , अमेरिकी क्रांति , सोवियत अक्टूबर क्रांति ,चीनी सर्वहारा क्रांति के विश्व व्यापी असर की उन्हें कोई जानकारी  नहीं है । आधुनिक तकनीकी दक्षता प्राप्त युवाओं को नहीं मालूम कि यह आधुनिक  संचार क्रांति या वैज्ञानिक समग्र क्रांति जिस साइंस की देंन  है । उसी  साइंस ने दुनिया में  सामंतवादी- शोषणकारी  राजनीति को पलटने का  काम  भी किया  है। विश्व व्यापी साइंस की खोजों ने ही यूरोप में पहले -पहले पूंजीवाद पर प्रजातंत्र को बढ़त दिलाई। और 'चर्च' की प्रभुसत्ता को नियंत्रित  करने  का काम  भी किया। दुनिया बाहर के गुलाम राष्ट्रों-पूर्व के  उपनिवेशों को मुक्त कराने में इस साइंस की भूमिका प्रमुख रही है। साइंस ने राजनैतिक -आर्थिक -सामाजिक  क्षेत्र में जो भी  क्रांतिकारी उलटफेर किये हैं ,वे ही  मार्क्सवाद या साम्यवाद के उत्प्रेरक हैं। इसी समग्र वैश्विक  क्रांतिकारी दर्शन ने  दुनिया  को क्रांति की नयी राह दिखाई है । वैज्ञानिक  भौतिकवाद ही साम्यवादी  दर्शन का मेरुदण्ड है। आधुनिक मोबाइल धारक युवाओं को यह ज्ञान भी  होना चाहिए। 

मार्क्स ,एंगेल्स तो साम्य वादी अन्वेषण के  महज निमित्त मात्र थे। यह व्यवस्था परिवर्तन का सिद्धांत अटल है ,यह हर देश में हर काल में अलग-अलग ढंग से होता ही रहता है। वक्त आने पर  भारत में भी इसे  होना ही है। लेकिन किस देश में -कब होगा - कैसे होगा ? यह उस देश के युवाओं की तासीर पर निर्भर है । क्रांति कब हो - कैसे  हो ? यह सम्बंधित देश की युवा सोच पर निर्भर है। क्रांति की प्रक्रिया को जान लेना ही मार्क्सवादी दर्शन का वैदिक  ब्रह्मज्ञान है। भारत में यह ज्ञान सर्वप्रथम मान्वेंद्रनाथ राय ,रजनिपामदत्त ,लोकमान्य  तिलक  , मुजफ्फर अहमद , शहीद भगतसिंह इत्यादि महान  क्रांतिकारियों  को  हुआ था। उन्होंने भारत में वोल्शिविक क्रांति के सपने देखे थे। किन्तु धूर्त अंग्रेजों ने भारत में जाति -धर्म के आधार पर एक से अधिक 'राष्ट्रीयताओं'को पॉपुलर किया। ताकि भारत में सर्वहारा क्रांति को रोक जा सके।  इसीलिये उन्होंने गांधी जी के 'अहिंसा' सिद्धांत को सराहा।  और और कांग्रेस -मुस्लिम लीग के  अलगाववाद को खास तवज्जो दी।

अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग व जिन्ना को पाकिस्तान के लिए उकसाया। सिखों को खालिस्तान के लिए उकसाया। तमिलों -तेलगु और अन्य गैर हिंदी -भाषा -भाषियों को उनके अलग-अलग राष्ट्रों के लिए उकसाया। अंग्रेजों ने ही दलितों और उनके नेताओं को जातीय आधार पर पृथक निर्वाचन के लिए उकसाया। जिसे महात्मा गांधी ने बड़ी सूझ-बूझ और मेहनत  से  'पूना पेक्ट ' के तहत आरक्षण व्यवस्था के रूप में लागू करवाया ।यदि आज गांधी जी और बाबा साहिब अम्बेडकर होते तो पटेलों-जाटों के तेवर देखकर अपना माथा कूट लेते।

 अंग्रेजों ने जाते-जाते ,कश्मीर,हैदराबाद,भोपाल,जूनागढ़ और अन्य कई राजाओं को 'भारत संघ' में शामिल होने से रोका।  उन्होंने उन्हें  देशी राजाओं को स्वतंत्र रहने के लिए उकसाया !इस अवसर पर कांग्रेस के अंदर जो अधिकांश लेफ्टिस्ट  ही थे उन्होंने भारत को एकजुट करने में सरदार पटेल और नेहरू का भरपूर साथ दिया। देश विभाजन के समय  हैदराबाद  के निजाम और उसके रजाकरों ने रॉयल सीमा औरआंध्र में  जितने कम्युनिस्ट मरवाए उतने तो पाकिस्तान में हिन्दू भी नहीं मारे गए होंगे।  ठीक इसी समय हिन्दू महा सभा के लोग भारत में धर्मनिरपेक्षता के नाम  पर गांधी जी को  निपटाने के षड्यंत्र रच रहे थे। जिसकी परिणीति नाथूराम गोडसे के हाथों गांधी जी की हत्या के रूप में हुई।

अच्छे -खासे पढ़े लिखे लोग भी कभी-कभी आर्थिक -राजनैतिक-दर्शन -सिद्धांतों को जाने बिना घोर फासीवादी संगठनों के प्रभाव में आ जाते हैं। इसी तरह राजनीतिक विश्लेषण क्षमता से विमुख कुछ प्रगतिशील लोग भी धर्मनिरपेक्षता और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भटक जाया करते हैं।  दक्षिणपंथी संकीर्णतावाद के प्रतिबिम्ब जैसे ही कुछ  वामपंथी भी वैचारिक  संकीर्णतावाद की खाई में जा गिरते हैं। पर्याप्त अध्यन के अभाव में संघ परिवार का बड़े से बड़ा प्रवक्ता भी मार्क्सवादी  नीति निदेशक सिद्धांतों से  अंजान ही रहता है। क्योंकि वह मार्क्सवाद  के प्रति सहज ही नकारात्मक भाव में होता है, इसलिए उससे किसी किस्म के विवेकपूर्ण विश्लेषण की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसी तरह अधिकांश मार्क्सवादी भी सर्वहारा -अंतर्राष्ट्रीयतावाद के प्रचण्ड चेता तो हो सकते हैं किन्तु उन्हें भावजगत  दर्शन के अध्यन में कोई रूचि नहीं होती। वे गीता-रामायण ,बाइबिल.कुरआन इत्यादि जैसे भाववादी साहित्य को समग्र रूप से पढ़ने -समझने की कोई खास चेष्टा नहीं करते। चूँकि  उन्होंने पहले से ही ठान रखा है कि  ''यह  सब बकवास है , पाखंडपूर्ण मिथकीय कूड़ा करकट है '' ! इसी तरह अन्य मजहबी ग्रंथों को पढ़े बिना  या  ठीक से जाने बिना उसके विमर्श में उलझकर ये लोग फिसड्डी सावित होते  रहते हैं।

इसीलिये संसदीय लोकतंत्र के त्रुटिपूर्ण चुनावों में असंगठित क्षेत्र की  बहुसंखयक जनता और अल्पसंख्य्क समूह तीसरे विकल्प या वामपंथ  की जीत को  संदेह की नजर से देखती है। लोक सभा या विधान सभा चुनावों के समय  गरीब- मजदूर-किसान जाति -धर्म -मजहब के पांतों में बट जाता है। और गफलत में अपने वर्ग शत्रु को ही वोट दे देता है। और  उसकी रहनुमाई के लिए तैयार सर्वहारा के हरावल दस्ते को हार का मुँह देखना पड़ता  है। अच्छे दिनों के भारत में यही सब चल  रहा है।मानव इतिहास के हर एक दौर में कुछ मुठ्ठी भर लोग  ही होते रहे हैं जो  हर किस्म के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ संगठित संघर्ष की रहनुमाई  किया करते रहे हैं। वे समाज और राष्ट्र के  सकारात्मक निर्माण में भी निष्णांत हुआ करते  हैं। ऐंसे उदात्त चरित्र के बलिदानी लोगों से ही  महाकाव्यों के धीरोदात्त चरित्र गढे  जाते रहे हैं। कालांतर में ,इन्हे ही देव ,इन्हें ही अवतारा ,इनको ही 'नायक' कहा जाता है। आधुनिक वैज्ञानिक भौतिकवाद और पुरातन मिथ -इतिहास एक दूजे के अन्योन्याश्रित हैं।

 आधुनिक विश्व क्रांतिकारी द्वन्दात्मक -भौतिकवादी विचार के प्रणेताओं ने उनके प्रगतिशील वामपंथी-साहित्य को जो   सम्मान दिया है ,वही  सम्मान  सामन्तयुगींन रीतिकालीन सौंदर्य साहित्य को भी सम्मान मिलना चाहिए। यह साम्यवादी दर्शन उतना ही पुरातन  है जितने की महाकाव्य। इसलिए दोनों ही समान रूप  से आदरणीय ,पठनीय और अवलोकनीय  है। भाववादी  महाकाव्य  साहित्य सृजन  न केवल भव्य  है अपितु निरंतर अध्यन  योग्य  भी है।  उसका अनुशीलन  प्रतिक्रांतिकारी नहीं  है अपितु किसी भी क्रांति चेतना के लिए यह जीवंत साहित्य की तरह  ही सर्वकालिक है। स्वामी विवेकानंद ,स्वामी श्रद्धानन्द,लाला लाजपत राय , काजी नजरूल इस्लाम ,रवींद्रनाथ टेगोर,अरविंदो ,ईएमएस नम्बूदरीपाद ,श्रीपाद डांगे इत्यादि ने भारतीय  महाकाव्यों का गहन अध्यन  किया था। इन सभी को यूरोप की वैज्ञानिक और भौतिक क्रांतियों का भी पर्याप्त  ज्ञान था। यही वजह है कि निर्विवाद रूप से  ये सभी  स्वतंत्र भारत के पथप्रदर्शक माने जाते हैं। वैसे भी  कुछ अपवादों  - क्षेपकों को छोड़कर अधिकांश भाववादी भारतीय साहित्य -खास तौर से पाली,प्राकृत ,अपभ्रंस ,संस्कृत -वांग्मय एवं  दर्शन अक्षरशः वैज्ञानिक आधार पर भी पर्याप्त अनुकरणीय है। मानवीय तो वह है ही ।भले ही यह  तमाम प्राचीन महाकाव्य सृजन नितांत अतिश्योक्तिपूर्ण  गप्पों का ही भण्डार ही  क्यों न हो किन्तु बन्धुता, परोपकार -न्यायप्रियता ,अपरिग्रह, उत्सर्ग ,सत्य -शील सृजन और  अन्य सनातन मूल्यों की अमूल्य धरोहरके रूप में ये  'कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो' के सिद्धांतों जैसे ही सर्वकालिक हैं।

महाभारत और उसके भीष्म पर्व में सन्निहित भगवद्गीता तो विश्व में बेजोड़ हैं। कुछ प्रगतिशील लोग इस मिथकीय साहित्य को बिना पढ़े ही हेय दॄष्टि से देखते हैं। इसी तरह अधिकांश  भाववादी और अंधश्रद्धा वाले मजहबी साम्प्रदायिक लोग भी 'दास केपिटल ' मार्क्सवाद या 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो'  इत्यादि को पढ़े बिना ही कम्युनिज्म पर टीका टिप्पणी करते रहते हैं। ये तथाकथित धार्मिक और भाववादी लोग अपने धर्म -पंथ के मूल्यों को जाने बिना और  इन गर्न्थो का सांगोपांग अध्यन किये  बिना ही उन की गलत सलत व्याख्या करते रहते हैं। वे अपने धार्मिक प्रयोजन के बहाने  इस शानदार पुरातन धरोहर रुपी अध्यात्म साहित्य को कर्म-कांड  धर्म-मजहब के बहाने  उसका बेजा दुरूपयोग करते रहते हैं।

वेशक वेद ,आरण्यक ,गीता इत्यादि ग्रन्थ  भी मूलतः भौतिकतावादी ही हैं। इनमें निहित भाववाद सिर्फ व्यष्टि चेतना के निमित्त ही है। सिर्फ रामायण महाभारत या अभिज्ञान शाकुन्तलम ही नहीं बल्कि पंचतंत्र-हितोपदेश जैसा लोक  साहित्य  भी केवल मिथ या कालकवलित सृजन नहीं है।  अजन्ता ,एलोरा ,खजुराहो,साँची -सारनाथ और  विशाल भारत में यत्र-तत्र -सर्वत्र विखरी पडी  विराट पुरातन  शिल्प  धरोहर में कुछ भी अवैज्ञानिक नहीं है। बिना  गणतीय सूत्रों ,प्रमेयों और भौतिक ज्ञान  के अतीत का यह सृजन सम्भव  भी नहीं था । अतः यह  पुरातन शिल्प ,पौराणिक -मिथकीय सृजन और साहित्य भी आधुनिक प्रगतिशील वैज्ञानिक खोजों की ही तरह न केवल ज्ञेय  और गम्य है बल्कि  सार्वदेशिक और सार्वकालिक  हैं।


  श्रीराम तिवारी !

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

एक मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस -जिन्दाबाद !




   दुनिया के मेहनतकशों -एक हो -एक हो !

   शिकागो  के अमर शहीदों को -लाल सलाम !!

   आयेगा भई  आयेगा -नया जमाना आयेगा !

   लूटने वाला जाएगा -कमाने वाला  खायेगा !!

   एक मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस -जिन्दाबाद !

    धर्मनिरपेक्षता जिंदाबाद -समाजबाद जिंदाबाद ! !

     साम्प्रदायिकता -मजहबी आतंकबाद -मुर्दाबाद !

     माल्याओं को पैदा करने वाला पूंजीबाद -मुर्दाबाद  

     वामपंथ का रास्ता -सही रास्ता -सही रास्ता !

     जेएनयू का रास्ता -सही रास्ता -सही रास्ता !!

   क्या मांगे मजदूर किसान ? रोटी कपडा और मकान !

    कौन बनाता हिन्दुस्तान ? भारत का मजदूर -किसान !
  
    अम्बानी-अडानी ,टाटा-बिडला  और उनके एजेंटों  के अच्छे दिन आये हैं !

   देश की सीमाओं पर ,खेतों -खलिहानों और विश्वविद्यालयों पर संकट के बादल छाये हैं !

  एक मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस -जिन्दाबाद !

     इंकलाब ज़िंदाबाद ! !

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

दुनिया में भारतीय विदेश नीति की खिल्ली उड़ाई जा रही है।

 'मोदी सरकार' से पहले वाले किसी भी  भारतीय नेता या प्रधान मंत्री ने चीन और पाकिस्तान के नेताओं पर कभी  विश्वाश नहीं किया। और यही वजह है कि  भारत को इन दुष्ट पड़ोसियों के सामने कभी इतना शर्मिंदा नहीं होना पड़ा ,जितना कि अब मोदी जी के राज में  भारत को शर्मिन्दा होना पड़  रहा है। हमारे हिन्दू दर्शन पारंगत  प्रधान मंत्री जी और उनके 'हमसोच' संघ बौद्धिकों की सिद्धांत निष्ठां में  श्रीकृष्ण या चाणक्य का अक्स तो  बिलकुल नहीं दिख रहा है। किन्तु पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान की रणनीति में भगवान  'श्रीकृष्ण की  नीति 'का असर  अवश्य झलक  रहा है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब कर्ण के रथ का पहिया रुधिर जनित कीचड़ में धस गया तो वह रथ से नीचे उतर गया और  पहिया उचकाने में जुट गया। जाहिर है कि कर्ण ने अपने धनुष बाण इत्यादि जमीन पर रख दिए होंगे  ! उस निहत्थे कर्ण को मारने के लिए  ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उकसाया था। परिणाम सामने था। दानवीर  महाबली कर्ण छल-बल से मारा  गया। झूँठे  दम्भ में अपना ५६ इंची सीना ठोकने वाले  भारतीय नेताओं की नादानी से अब जबकि  भारत के रथ  का पहिया  धराशायी  हो रहा है ,अदूर - दर्शिता ,कुशासन, गरीबी,सूखा ,आतंकवाद , आरक्षण आंदोलन ,भृष्टाचार के दल-दल में  भारत बुरी तरह फंस गया है। ऐंसे में चीन रुपी  श्रीकृष्ण ने पाकिस्तान रुपी अर्जुन को उकसाया है कि वह आतंकवाद रुपी शिखण्डी की ओट से भारत रुपी  निहत्थे कर्ण पर  प्राणघातक हमला करे !

पहले तो भारत के सत्ताधारी नेताओं ने विदेश नीति का सही आकलन किये बिना ,संसद को विश्वाश में लिए बिना,यूएनओ में चीन की भूमिका को जाने बिना -पाकिस्तानी आतंकी अजहर मसूद और जेश -ए-मुहम्म्द पर प्रतिबंधात्मक पस्ताव पेश कर दिया। चूँकि चीन ने वीटो कर दिया और भारत यूएनओ में हार गया।भारत की याने  हमारी बहुत  किरकिरी हुई। दुनिया में  भारतीय  विदेश नीति की  खिल्ली उड़ाई जा रही है। इस गलती को सुधारने के लिए डोभाल साहब  और सुषमा जी ने चीन के अलगाववादी उइगर नेता दोलकुंन इशा  को भारत का बीजा दे दिया। इतना कदम उठाना तो फिर भी जायज लग रहा था। किन्तु चीन के एक इशारे पर  दोलकुन का  बीजा  वापिस ले लिया यह किस देशभक्ति का सबूत है ? दोलकुन का बीजा  किस मजबूरी  में रद्द किया गया ?यह भारत की जनता को अवश्य जानना चाहिए।

भाजपा और संघ परिवार को बहुत गलत फहमी है कि ''चीन और पाक़िस्तान तो दूध के धुले पड़ोसी देश हैं ,वो तो हमारे पहले वाले प्रधान मंत्री  ही नाकारा और नालायक थे इसलिए समस्याएं हल नहीं हुईं '' ! दरसल इसी गलत धारणा से संघ परिवार संचालित हो रहा है। वरना मोदी जी विदेशों में जाकर यह नहीं कहते कि 'भारत के पहले वालों  सत्तारूढ़ नेताओं ने  तो ६७ साल में कुछ  भी नहीं किया अब हम आ गए हैं सो सब ठीक कर देंगे ''!इन संघियों को एक और  बहुत बड़ी गलत फहमी है कि  भारत के वामपंथी  तो चीन के शुभचिंतक हैं। वास्तव में वे भारतीय वामपंथ  और कम्युनिस्ट पार्टी आफ चायना ' के बीच के मतभेदों को न तो जानते हैं और न ही उन्हें यह सब जानने में कोई रूचि है। वे तो इस २१वीं शताब्दी में भी उसी ९० साल पुराने गोलवलकरी साहित्य से ही  संचालितहो रहे हैं।जिसमें कम्युनिस्टों ,दलितों,मुस्लिमों ,ईसाइयों को संघ का स्थाई  शत्रु मान लिया गया है।

  प्रायः हरेक  प्रबुद्ध भारतीय को अपने  वतन की फ़िक्र है। यही वजह है कि  जब किसी खेल  विशेष में भारत के खिलाड़ी जीत दर्ज कराते  हैं ,तो  पूरे भारत में आतिशबाजी होती है।वैसे तो भारत की अधिकांश जनता अपने  सभी पड़ोसी मुल्कों से दोस्ताना मैत्रीभाव की कायल रही है।  किन्तु  जब  कभी कोई पड़ोसी मुल्क  भारत की ओर बुरी नजर डालता है तो भारत की आवाम उसे माकूल जबाब देने को सदैव  तैयार रहती है। किन्तु इस संदर्भ में 'संघमित्रों' का रवैया नितांत अभद्र और बचकाना रहा है। उन्हें पता नहीं कौनसी जन्म घुट्टी पिलाई जाती है कि  वे अपने अलावा बाकी सभी भारतीयों को देशद्रोही ही समझते हैं। भले ही उद्धव ठाकरे कहते रहें कि जेएनयू छात्र  कन्हैया कुमार को देशद्रोही कहना गलत है ।  किन्तु संघ परिवार' के दुमछल्ले बाज नहीं आयंगे क्योंकि  वे  ओंधी खोपड़ी जो ठहरे !  श्रीराम तिवारी 
 

रविवार, 24 अप्रैल 2016

क्या धर्म-मजहब की ओट में छिपा अपराधी - कानून से परे हो जाता है ?




  समस्त संसार में उज्जैन सिंहस्थ को भले ही बड़े आदर और कौतुहल से देखा जा रहा हो ,लेकिन ऐंसा लगता है कि  यहाँ पधारे नकली  साधू संतों द्वारा कानून का पालन  बिलकुल नहीं किया जाता।  अव्वल तो ये फोकटिए हर उस चीज की मांग करते हैं जो एक साधु या संत के लिए त्याज्य है। ये साधु -बाबा लोग तो हर ऐशोआराम की मांग कर  रहे हैं मानों ये  प्रदेश सरकार के जँवाई  हों ! जरा सी चूक हुई नहीं कि  ये धूर्त बाबा लोग जन प्रतिनिधि और मंत्री को भी डांटने -डपटने से नहीं चूकते। क्योंकि इससे उनके अहम -दर्प को संतुष्टि मिलती है। किसी  की  रंचमात्र भूल या कमीवेशी पर  पुलिस को दौड़ा- दौड़ाकर  मारने ,श्रद्धालुओं  के सर फोड़ने  से ये बाज नहीं आते।  मेले  में चोरी चकारी के कारनामों से  'महाकाल बाबा ' खुश होंगे यह तो सम्भव नहीं। और पावन शिप्रा भी  इन्ही तत्वों द्वारा कब की मैली हो चुकी है। मध्यप्रदेश सरकार ने  करोड़ों रुपया खर्च कर इसकी सफलता के  खूब विज्ञापन परोसे  और जनता  के श्रम  की कमाई का बड़ा हिस्सा इस सिंहस्थ में स्वाहा हो चुका है। किन्तु न तो साधु-संत  संतुष्ट हैं ,न श्रद्धालु संतुष्ट है और'भोलेबाबा'संतुष्ट होंगे इसकी  भी समभावना बहुत कम  है। !

यह  तो सभी जानते हैं कि अधिकतर  साधु कौन बनता है ? सिर्फ आसाराम ,नित्यानंद ,नारायण साईं या राधे माँ  के बदनाम हो जाने से इस प्रश्न का उत्तर सम्भव नहीं है। कुछ बदमाश गुरुघंटालों के नाम उजागर हो जाने से भी समस्त 'संत समाज' या 'साधु मण्डली' की असलियत जान पाना संभव नहीं है। धर्मान्धता और पापा पंक की  दल-दल बहुत गहरी है। यह क्रानिक -संक्रामक बीमारी प्रायः हर समाज  - धर्म -मजहब में उनकी अनैतिक  गटर गंगाओं में अपने -अपने तरीके से बहा करती है। किसी भी सभ्य समाज के  सुसंस्कृत सदाचारी ,क्रांतिकारी एवं ज्ञानिक नजरिए वाले व्यक्ति को इतनी फुर्सत  नहीं कि लम्बी दाड़ी ,जटाएँ बढ़ाकर -नंग-धड़ंग होकर कुम्भ मेले की धूल फांकता फिरे या सफ़ेद धोती पहिनकर हज यात्रा में शैतान को पत्थर मारने के चक्कर में खुद घन चक्कर होता फिरे !

जो लोग निजी जिंदगीं में असफल होकर घोर फ्रस्टेशन और निराशा के शिकार हो जाया करते हैं , जो लोग जाने-अनजाने अपना शील ,सत्य,शौर्य और आपा खो  बैठते हैं ,जो लोग सामाजिक या राष्ट्रीय अपराध कर बैठते हैं ,वे तमाम हत्यारे,बलात्कारी ,डाकू  -चोर ,ड्रग माफिया ओर कानून  की नजर से भागे हुए अपराधी  ही इस मजहबी  अन्धश्रद्धा के  अंधकूप में छलांग लगाते रहते  हैं। ये सामाजिक परजीवी -अमरवेलि के खाद पानी हैं। कुम्भ मेले में जो बाबा हाथ में त्रिशूल लेकर पुलिस को मारने दौड़ता है ,उस पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं होती। क्या धर्म-मजहब की ओट में छिपा अपराधी  कानून से परे हो जाता  है ? इन [अ ]साधुओं का अहंकार तब आसमान पर होता है ,जब कोई कलेकटर, एसपी ,इंजीनियर,व्यापारी, मंत्री, मुख्य्मंत्री , प्रधान मंत्री अथवा राष्ट्रपति भी इनके चरणों में धोक देता है।   श्रीराम तिवारी !

गुरुवार, 31 मार्च 2016

''बोले बिहँसि महेस तब , ज्ञानी मूढ़ न कोय ।


  आज 'मूर्ख दिवस 'है। इस मूर्ख दिवस पर सभी 'मूर्खानंदों को हार्दिक शुभकामनाएँ। आम तौर पर कोई भी अपने आपको मूर्ख कहलाना  करता। किन्तु  यह कटु सत्य है कि इस संसार में कोई भी चेतन प्राणी नहीं जो स्वतंत्र  या निरपेक्ष रूप से ज्ञानी  अथवा अज्ञानी हो !सभी ने   भरम पाल रखा है कि वे  ज्ञानी हैं । कुछ  तो  बड़े  महाज्ञानी  हैं।  कुछ साक्षात् ' वर्णानाम अर्थ छन्दानाम,रसानाम छन्दसामपि 'ही हैं । लेकिन  ऍतद द्वारा सभी   को सूचित किया जाता है कि अपना -अपना  भरम कमसे कम आज एक दिन के लिए त्याग दें। यही इस मूर्ख  दिवस की सार्थकता हो सकती है। वैसे भी  महान संत और भक्त कवि  गोस्वामी तुलसी दास बाबा अपने  ग्रन्थ 'रामचरित मानस' में  लिख  गए हैं :-

''बोले बिहँसि  महेस तब , ज्ञानी  मूढ़  न  कोय ।

जेहिं जस रघुपति करहिं जब ,सो तस तेहिं छन होय।। ''


अर्थात :- शंकर जी कहते हैं ! हे पार्वती सुनो ! इस  बृह्मांड में  न तो कोई ग्यानी है और न ही कोई मूर्ख है , [रघुपति] भगवान की जब जैसी इच्छा होती है ,तब वह प्रत्येक  प्राणी को वैसा बना  देते हैं।

भावार्थ :- कोई भी इस  भ्रम  में न रहे  कि वह सर्वकालिक ज्ञानी है ,या  सर्वकालिक मंदमति है। वास्तव में मष्तिष्क रुपी कम्प्यूटर में  जब ज्ञानेन्द्रियों  द्वारा  पृकृति की घटनाओं की  सकारात्मक और  वास्तविक छवि प्रेषित की जाती है तब  आउट पुट के रूप में जो 'सर्वजन हिताय' के ज्ञान और विवेक का उद्दीपन प्रकट होता है तब  हम ग्यानी होते हैं। जब हम  झूंठ ,छल,कपट और स्वार्थ के वशीभूत होकर मष्तिष्क को असत्य आचरण का इनपुट देते हैं तो परिणाम में हमें हमारी दयनीय मूर्खता का पिटारा प्राप्त होता है। यह ज्ञान और अज्ञान का बोध निरंतर अपरिवर्तनशील है। वास्तव में  परफेक्ट ग्यानी कोई नहीं होता। एक ही व्यक्ति  कभी सापेक्ष ज्ञानी हो जाता है और  कभी सापेक्ष मूर्ख हो सकता है । देश काल परिस्थिति  या  काल कर्म स्वभाव गुण के वशीभूत  कुछ लोग सज्जन और विद्वान होते हैं। जबकि नकारात्मक और  विपरीत  स्वभाव  वाले मनुष्य   बहुत शातिर और धूर्त  होते हैं।  जो ओरों को ठगते हैं ,ओरों को मूर्ख समझकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं ,वे ग्यानी नहीं बल्कि  चालाक' होते हैं।  झूंठ - कपट पर आधारित जीवन जीने वाला या आपराधिक- सामाजिक  परिवेश का  कोई भी शख्स  आत्मतुष्टि प्राप्त नहीं कर सकता। वेशक 'रत्नाकर' से बाल्मीकि हो जाने पर वह भी ज्ञान और विवेक से प्रकाशित हो सकता। क्योंकि  ज्ञान तो  मानवीय मूल्यों का   प्रकाशक है। सभी सुख सम्पदा का हेतु है। जबकि अज्ञान केवल  अन्धकार का सूचक है और समस्त दुखों  का हेतु है। 

श्रीराम तिवारी  


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