गुरुवार, 18 अगस्त 2016


  भाव  भगत भादों नदी,बढ़त-बढ़त बढ़ जाय।

  सरिता वही सराहिये ,जो जेठ मास  ठहराय।। ...[अज्ञात]


अर्थ :- मानवीय  सम्बन्धों की सार्थकता तभी है, जब बुरे बक्त में भी भाईचारा और मित्रताका निर्वहन हो। 'सुख के सब साथी ,दुःख में न कोय' के सिद्धांत को झुठलाकर ,जो लोग अपने बेबस -लाचार ,दुखी -मित्रों,बन्धु -बांधवों से मुख नहीं मोड़ते और सदा साथ निभाते हैं ,उनमें मानवीय संवेदनाओं की अविरल धारा निरन्तर प्रवाहमान होती रहती है। यह मानवीय व्यवहार और सामाजिक सरोकार -सदानीरा गंगा-ब्रह्मपुत्र नदियों की मानिन्द हुआ करता है,जो जेठ के महीने में भी कल -कल बहा करतीं हैं। जो व्यक्ति केवल  'अच्छे दिनों' का ही बगलगीर है और बुरे बक्त में रंग बदलता है  वह बरसाती नाले या गटर की तरह होता है,जैसे भादों के महीने में तो नाले और गटर भी 'नदी;होने का भ्रम पैदा करते हैं किन्तु जेठ महीने में वहाँ धुल उड़ा करती है।  श्रीराम तिवारी ! 


बुधवार, 10 अगस्त 2016

शीला दीक्षित से सीखो -केजरीवाल


दिल्ली हाई  कोर्ट ने  एल जी [उपराज्यपाल]को दिल्ली क्षेत्र की प्रभुसत्ता के लिए सर्वशक्तिमान बताया है,उससे पहले एक अन्य प्रकरण में दिल्ली पुलिस को भी दिल्ली सरकार के प्रति 'अनुत्तरदायी' बताया है। एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी आप' के मुख्यमंत्री  केजरीवाल और उनकी सरकार को 'केंद्र सरकार 'के कर्मचारियों की जाँच नहीं करने का निर्देश दिया है. भृष्टाचार में लिप्त कर्मचारियों-अधिकारियों पर किसी भी तरह की दंडात्मक कार्यवाही  से भी वंचित किया है। कहने का लुब्बो-लुआब ये है कि न्यायपालिका ने 'आप'की  दिल्ली सरकार को 'शून्य' घोषित कर  दिया है। 'आप ' नेता केजरीवाल  जी कोई काम नहीं कर पाने के कारण घोर अशांत हैं।

दिल्ली 'राज्य' की संवैधानिक स्थिति तब भी यही थी ,जब शीला दीक्षित  दिल्ली की मुख्य मंत्री थीं। उन्होंने भी दिल्ली राज्य को 'राज्य का पूर्ण दर्जा 'माँगा था ,किन्तु उन्होंने उस मांग को असफलता का बहाना नहीं बनाया। शीला जी ने १५ साल लगातार  दिल्ली  पर शासन किया और इतने  काम किये हैं कि  गिनना मुश्किल है और उन्होंने कभी किसी अदालत में अधिकार नहीं होने या एल जी के असहयोग का रोना भी नहीं रोया। दिल्ली पुलिस से जरुर वे परेशान रहीं ,किन्तु विकास कार्य रुकने नहीं दिए। इसलिए सुझाव है कि शीला दीक्षित से भी कुछ सीखो -अरविन्द केजरीवाल ! श्रीराम तिवारी

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

मोदी जी -'पाहुनों से साँप नहीं मरते '


सुप्रसिद्ध साहित्यकार  महाश्वेता देवी के निधन पर देश और दुनिया के प्रबुद्ध वर्ग ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये, किसी ने शब्दांजलि ,किसी ने श्रद्धांजलि और  किसी भावांजलि व्यक्त की । भाजपा नेताओं और उनकी सरकार के मंत्रियों में तो श्रद्धांजलि देने की होड़  सी मच गई।  इस होड़ की हड़बड़ी में बड़ी गड़बड़ी हो गई।  विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्ववीट किया कि महाश्वेता देवी की दो साहित्यिक कृतियों -'प्रथम प्रतिश्रुति' और 'बकुल कथा 'से उन्हें बहुत प्रेरणा मिली है । उनके इस ट्वीट को लगभग चार सौ ट्वीटर  'विद्वानों' ने लाइक भी कर  दिया,लेकिन सुषमा जी को जब किसी शुभचिंतक ने सूचित किया कि ये दोनों रचनाएँ तो आशापूर्णा  देवी की हैं ,तो उन्होंने अपने शोक संदेस को टवीटर से हटा लिया। दूसरा वाक्या भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह जी का है ,जो  काफी रोचक है। टवीटर पर महाश्वेता देवी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अमित शाह जी ने  'हजार  चौरासी की माँ ' और  'रुदाली' को  महाश्वेता देवी  की अत्यंत प्रभावशाली रचनाएँ बताया । अमित शाह जी को शायद मालूम ही नहीं कि 'हजार चौरासी की माँ'  से यदि वे प्रभावित हैं तो वे भाजपा में  क्यों हैं ? उन्हें तो  नक्सलवादियों  के साथ या माओवादियों के साथ होना चाहिए था !क्योंकि 'हजार चौरासी की माँ ' नक्सल आंदोलन की  प्रबल पक्षधर है।

 दरसल भाजपा और संघके बौध्दिकों में वैचारिक दरिद्रता और द्वंदात्मक  चिंतन की कंगाली है, वे गुलगुले तो  गप-गप खा जाते हैं ,किन्तु गुड़ खानेके परहेज  का पाखण्ड करते हैं। उन्हें जहाँ कहीं कोई नजमा हेपतुल्लाह या जगदम्बिका पाल  जैसा विद्रोही कांग्रेसी दिखा ,जहाँ कहीं कोई सुरेश प्रभु जैसा विद्रोही  शिवसैनिक  दिखा ,जहाँ कहीं कोई पथभृष्ट जीतनराम मांझी दिखा ,कोई   'सुधारवादी वामपंथी' समाजवादी  दिखा कि भाजपा वाले उसे अपने 'पाले'में घसीट लाने की जुगत में भिड़ जाते हैं। केरल विधान सभा चुनाव  में माकपा- एलडीएफ की जीत पर मोदी जी ने सीपीएम पार्टी को नहीं, पिनराई  विजयन को नहीं, बल्कि अच्युतानंदन को  फोन पर बधाई दी।  क्योंकी मोदीजी को मालूम था  कि बुजुर्ग कामरेड अच्युतानंदन  पिनराई  विजयन और पार्टी नेतत्व से 'नाराज' हैं। भाजपा वाले  पक्के घर फोड़ू हैं। ये लोग किसी मेट्रिक फ़ैल को मंत्री ,किसी असफल गुमनाम कलाकार को एफटीटीआई का अध्यक्ष बना देंगे और किसी काले कौवे को 'भारत रत्न ' बना लेंगे। किन्तु ज्योति वसु, माणिक सरकार का सम्मानपूर्वक नाम ,सपने में भी नहीं लेंगे। क्योंकि 'संघ' वाले अपने अलावा और किसी विचारधारा का 'अनुशासन' पसन्द करते !

हिंदुत्ववादी वीरों ने  'असहिष्णुता'और अभिव्यक्ति  के मुद्दे पर नामवरसिंह द्वारा अलग -थलग स्टेण्ड लेने पर  उनकी  भूरि -भूरि प्रशंसा की है , नामवरसिंह के जन्म दिन पर मोदी जी ने बधाई सन्देश भेजा और देश के गृह मंत्री राजनाथसिंह जी ने खुद उपस्थित होकर शिद्दत से नामवरसिंह का जन्म दिन मनाया ! लोगों के मन में  प्रश्न उठ रहे हैं  कि  क्या यह 'भाजपा'का हृदय परिवर्तन है ? क्या ऐंसा करके भाजपाई नेता उन मार्क्सवादी वामपंथी -नामवरसिंह के लिखे हुए को  मिटा सकते हैं। और नामवरसिंह ने ऐंसा  कहाँ-कब-क्या लिख दिया जो गोडसे या गोलवलकर के 'चिंतन'से मेल खाता है ? यदि नामवर के बहाने भाजपा नेताओं ने 'सबका साथ -सबका विकास 'मन्त्र पर अम्ल किया है , तब तो ठीक है। किन्तु उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि 'भरोसे की भैंस पाड़ा नहीं जनती 'और 'नटवन खेती -बहुअंन घर नहीं चलते '!'पाहुनों से साँप नहीं मरवाते 'अनेक प्रमाण हैं जहाँ 'संघ' और भाजपा ने पथभृष्ट दलबदलू कांग्रेसी , दिग्भृमित वामपंथी ,उजबक समाजवादी और महत्वाकांक्षी  शिवसैनिक को अपना 'कर्ण 'बनाया है ! मोदी जी खुद दुर्योधन की तरह इन सभी को 'अंगराज'कर्ण बनाते जा रहे हैं ,उधर उनके 'वैचारिक सहोदर' दलित -उत्पीड़न और नारी विमर्श में दुशासन की भूमिका अदा किये जा रहे हैं !  श्रीराम तिवारी

शनिवार, 30 जुलाई 2016


भोपाल  में शनिवार -दि.३०-७-१६, राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ और भाजपा वालों की जॉइंट मीटिंग सम्पन्न हुई। मीटिंग में उपस्थित 'संघ वालों' ने अपनी समीक्षा रिपोर्ट  में भाजपा सरकार को असफल बताया और वह रिपोर्ट प्रेस को भी रिलीज कर दी। मेरी नजर में इसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं। हालाँकि संघ की समीक्षा रिपोर्ट में  सिंहस्थ भृष्टाचार,व्यापम भृष्टाचार या दिलीप बिल्डकॉन नुमा  भृष्टाचार पर एक शब्द  नहीं कहा गया,किन्तु फिर भी 'संघ' वालों ने शिवराज सरकार को उसका असफलता का आइना जरूर दिखाया  है। समीक्षा रिपोर्ट में साफ़ किया गया है कि ''मध्यप्रदेश सरकार का कोई भी काम जमीन पर नहीं दिख रहा है और जनाधार भी खिसक रहा है ''! इसके उलट  शिवराज के पिछलग्गू अधिकारी ,मंत्री एवम पार्टी नेता अखवारों में ,टीवी पर और सोशल मीडिया पर जोर-जोर से काल्पनिक विकास और उपलब्धियों का ढपोरशंख बजाये जा रहे हैं। सवाल है कि संघ और भाजपा के इस 'राग छ्त्तीसी'आकलन में उन लोगों के क्या  विचार  हैं  जो 'संघ' परिवार के अंध भक्त हैं ?जो लोग सोशल- इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में  भृष्ट भाजपा सरकारों के पक्ष में खड़े हैं ,वे इस समीक्षा विमर्श के मुद्दे पर  'संघ' और भाजपा में से किसी एक को ही चुन सकते हैं ! यदि वे 'संघ 'समर्थक हैं तो संघ की समीक्षा का समर्थन करें। और भाजपा की असफलता पर हल्ला बोलें। यदि वे भाजपा समर्थक हैं तो 'संघ' की समीक्षा' को रद्दी की टोकरी में डालने का ऐलान करें।  और संघ के अंध भक्त होने का पाखण्ड बन्द करें !

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

तानशाह पैदा नहीं होते अपितु जनता द्वारा पैदा किये जाते हैं।

परिवार में ,कुटुंब -कबीले में ,समाज में या मुल्क में  किसी व्यक्ति विशेष के शौर्य ,अवदान और उदात्त चरित्र के कारण उस व्यक्ति को 'अवतार' अधिनायक या  'हीरो'मानने की परम्परा दुनिया में पुरातनकाल से रही है। लेकिन भारत में अजीब स्थिति है। यहाँ तो बिना किये धरे ही ,बिना त्याग बलिदान वाले लोग, अपनी चालकी ,धूर्तता और बदमाशी से 'हीरो' या अधिनायक बनते देखे गए हैं। वास्तविक हीरो ,बलिदानी या नायक इतिहास के हासिये से भी गायब कर दिए जाते हैं। जैसे कि मध्यप्रदेश के व्यापम सिस्टम के चलते हजारों वास्तविक 'नायक' वेरोजगार हैं या मनरेगा की मजदूरी कर रहे हैं। जबकि नकली अभ्यर्थी और बदमाश- मुन्नाभाई लोग अफसर- बाबू बनकर सत्ता से ऐसे चिपक गए कि देखकर गोह भी लाज जाए।

यही स्थिति पूँजीवादी -दक्षिणपंथी राजनीति की है। यही स्थिति जातीय -सामाजिकआन्दोलनों की और धार्मिक आयोजनों  की भी है। यही स्थिति स्वाधीनता सेनानियों की है। यही स्थिति मीसा बंदियों की है।हर क्षेत्र में चालाक और काइयाँ किस्म के लोग लाइन तोड़कर जबरन घुस जाते हैं। यही 'दवंग'लोग विद्या विनय सम्पन्न बेहतरीन युवा शक्ति को कुंद करदेते हैं। कुछ तो उन्हें धकियाकर किनारे लगा देतेहैं, खुद ही व्यवस्था के 'महावत' बन जातेहैं।  बड़ेखेद की बात है कि समाज के कुछ उत्साही लोग इन बदमाशों को ही हीरो मान लेते हैं। कुछ तो कालांतर में अवतार भी मान लिए  जाते हैं। इन नकली 'हीरोज' के कारण ,नकली अवतारों के कारण ही अतीतके झगडे कभी पीछा नहीं छोड़ते। जिन अवतारों ,पीर पैगम्बरों के कारण तमाम आधुनिक पीढ़ियाँ आपस में लड़ती -झगड़ती रहें उन पर सवाल उठाना भी गुनाह माना जाता है। भारत-पाकिस्तान के बीच जो अनवरत वैमनस्य चल रहा है, और तमाम देशों में  जो सामाजिक ,जातीय संघर्ष जारी है ,भारतमें आरक्षण वादियों और अनारक्षणवादियों के बीच जो हो रहा है ,वह सब इसी अतीत की काली छाया का परिणाम है। अचेत और साधारणजन भी इस स्थिति के लिए पर्याप्त जिम्मेदार हैं , वे इन नकली नायकों' की जय-जय कार करने में व्यर्थ ही अपनी ऊर्जा व्यय करते रहते हैं। बेईमान-बदमाश -नायकों के पीछे जय-जयकार करने वाले लोग उन  बगल बच्चों की तरह होते हैं जो हाथी के पीछे -पीछे ताली बजाकर अपना मनोरंजन कर लेते हैं। इतिहास साक्षी ही कि जनता की गफलत के कारण ही अक्सर चालाक लोग लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच जाते हैं। तानाशाह यहीं से पनपता है और अधिनायकवाद यहीं से जन्म लेता है।  


भारत की वर्तमान छल-छदम और सामाजिक विद्वेष की राजनीति से बदतर ,दुनिया में अन्य कोई राजनैतिक व्यवस्था नहीं है। वैसे तो इस पूंजीवादी-सामंती व्यवस्था का  विस्तार विश्वव्यापी है किन्तु जिस तरह भारत के   गरीब मतदाताओं के वोट पाने के लिए नेता -नेत्रियाँ  अनैतिक पाखण्ड करते हैं ,जिस तरह अपनी वंशानुगत योग्यता को जब-तब आम सभाओं में पेश करते रहते हैं। यह विशेष राजनैतिक योग्यता दुनिया में शायद ही कहीं अन्यत्र मिलेगी ! यहाँ चाय बेचने से लेकर ,भैंसें चराने वाले तक ,रंगदारी बसूलने से लेकर खुँखार डकैतों की गैंग में शामिल होने वाले तक विधान सभाओं में और लोक सभा में पहुँचते रहे हैं। यहाँ पैदायशी दलित-पिछड़े होने से लेकर धर्म-मजहब का ठेकेदार होने तक और जात -खाप से लेकर अपराध जगत का बाप होने तक की तमाम नैसर्गिक योग्यता प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।आजादी के तुरन्त बाद मुबई से लेकर दुबई तक और झुमरी तलैया से लेकर दिल्ली तक राजनीति में अपराधियों का बहुत वर्चस्व रहा है। सिर्फ लाल डेंगा जैसे अलगाववादी ही नहीं बल्कि रतन खत्री ,हाजी मस्तान,दाऊद,छोटा शकील ,बड़ा राजन ,अलां घोड़ेवाला ,फलां दारूवाला और ढिकां सट्टा वाला जैसे 'देशद्रोही' ही भारत की राजनीति संचालित करते आ रहे हैं। धरती पकड़ अपराधियों- दवंगों के आगे अधिकांस सज्जन नेता,ईमानदार पुलिस अफसर और कानून के रखवाले भी अपराध जगत की गटरगंगा में डुबकी लगाते रहे हैं। फिल्म वाले - निर्माता,निर्देशक ,फायनेंसर ,हीरो, हीरोइन और वितरक तो इस अपराध जगत में टूल्स की तरह इस्तेमाल होते रहे हैं। वैसे तो राजनीति की पूरी की पूरी हांडी ही काली है किन्तु यूपी, बिहार, महाराष्ट्र ,आंध्र,कर्नाटक ,पंजाब के अधिकांस राजनेता इस अपराध जगत में  ज्यादा कुख्यात रहे हैं।  तानशाह पैदा नहीं होते अपितु जनता द्वारा पैदा किये जाते हैं।

 भारत में   'बहुजन समाज' के वोट हड़पने के लिए ,दलित-पिछड़ेपन के जातीय विमर्श को बड़ी चालाकी और धूतता से हमेशा जिन्दा रखा जाता है। कुछ नेता-नेत्रियाँ न तोआर्थिक नीति जनते हैं, न विकासवाद जानते हैं ,न उन्हें 'राष्ट्रवाद' से कोई मतलब है  वे तो केवल सत्ता सुख के लिए  अपनी जातीय वैशाखी पर अहोभाव से खड़े हैं। उनके   तथाकथित नॉन ट्रान्सफरेबिल वोटर्स भी बड़े खब्ती, कूढ़मगज और भेड़िया धसान होते  हैं। उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद,एकता -अखण्डता और देश के सर्वांगणींण वैज्ञानिक विकास से कोई लेना देना नहीं। उन्हें सिर्फ अपने नेता -नेत्री की चिंता है जो उन्हें 'आरक्षण' की वैशाखी पकड़ाए रखने का वादा करता/करती है !

कुछ दलितवादी नेताने बहुजन समाजको वर्ग चेतना [Educate,Agitate,Orgenize] से लेस करने के,उन्हें जात -एससी/एसटी के रूप में पर्मेनेंट वोटों का भंडार बना डाला है। उन्होंने शोषित-दलित उत्थानके बहाने जातीयता की राजनीति को अपनी निजी जागीर बना डाला है। जातीयतावादी नेताओं द्वारा जाती को राजनीति का केंद्र बना लेने से  भारतीय समाज में विध्वंशक जातीय संघर्ष की नौबत आ गयी है । सत्ता के भूंखे जातिवादी-मजहबपरस्त नेताओं ने दमनकारी जातीयताके खिलाफ संघर्ष छेड़ने के बजाय उसे सत्ता प्राप्ति का राजनैतिक अवलम्बन बना लिया गया है। इन हालात में भारत जैसे देश में किसी सकारात्मक क्रांति की या किसी कल्याणकारी पुरुत्थान की कोई समभावना नहीं है।

अतएव कभी कभी तो लगता है कि वर्तमान जातीय-मजहबी नेताओं के चोंचलों से तो  'यूटोपियाई पूँजीवाद'ही बेहतर है !कमसेकम पूँजीवदी -विज्ञानवादी व्यवस्था में 'दान-पूण्य'धर्म-कर्म का आदर्श आचरण तो जीवित है। खबर है कि भारत के प्रख्यात हीरा व्यापारी सावजी ढोलकिया ७ हजार करोड़ की सम्पत्ति के मालिक हैं। उन्होंने गत वर्ष अपने कर्मचारियों को दीवाली पर तोहफे में फ्लेट और कारें दीं थीं।  जबकि इन्ही ढोलकिया जी ने अपने एकलौते बेटे को खुद के बलबूते पर अपनी हैसियत निर्माण के लिए घर से खाली हाथ निकाल दिया था। उन्होंने अपने बेटे को पाथेय के रूप में केवल  स्वावलंबी होने का मन्त्र दिया था। उनका बेटा  अभी भी कोचीन की किसी कम्पनी में  ४ हजार रुपया मासिक की प्रायवेट नौकरी कर रहा  है। उसे यह नौकरी हासिल करने के लिए भी तकरीबन  ६० बार झूँठ बोलना पड़ा। और कई दिन तक एक टाइम अधपेट भोजन पर ही रहना पड़ा । क्योंकि पिता ने  घर से चलते वक्त उसे जो ७०० रूपये दिए थे,उन्हें खर्च करने की मनाही थी। वे रूपये  उसके पास अभी भी सुरक्षित हैं और पिताजी ने यही आदेश दिया था की यह पैसा खर्च मत करना ! खुद कमाओ और खर्च करो !   'स्वावलंबी बनो '! यदि सावजी ढोलकिया जैसे पूँजीपति इस देश के नेता बन जाएँ और प्रधानमंत्री बना दिए जाएँ
तो भारत के गरीब किसान-मजदूर और सर्वहारा को भी शायद इससे कोई इतराज नहीं होगा। यदि ढोलकिया जैसे  राष्ट्रीय  पूँजीपति वर्ग के हाथों में देश की सत्ता देदी जाए तो शायद यह देश ज्यादा सुरक्षित होगा ,ज्यादा गतिशील और विकासमान हो सकता है !  

श्रीराम तिवारी

बुधवार, 20 जुलाई 2016

पंजाब में ''हंसना मना है ''!


 पंजाब में  शिरोमणि अकालीदल -भाजपा गठबंधन की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। बादल परिवार की निजी 'शहंशाही तड़क -भड़क 'ने  पूरे पंजाब को कर्ज के गर्त में धकेल दिया है। युवाओं में  बेतहाशा बढ़ती जाती नशे की लत और वेरोजगारी ने वर्तमान पंजाबको  'उड़ता पंजाब' बनाकर रख दिया है। उधर कांग्रेस की आपसी खींच -तान और सिरफुटौव्वल के कारण अमरिंदर सिंह  का मार्ग भी कंटकाकीर्ण  ही है। कांग्रेसी नेतत्व तो पहले से ही अपनी दागदार छवि से आक्रान्त और पथरीला है। लेकिन कहावत है कि 'उम्मीद पर दुनिया कायम है ' पंजाब के लोगों को यह खुशख़बरी ही है कि राज्यसभा सीट को लतियाकर 'सिध्दू पाजी'  पंजाब  विधान सभा के आगामी चुनावों में  सक्रिय  भूमिका अदा करेंगे।  यदि  वे खुदा -न -खास्ता विधान सभा में पहुंच जाते है या मंत्री पद पा जाते हैं तो पंजाब  विधान सभा और पंजाब का मौजूदा ग़मगीन  चेहरा फिर से खिल उठेगा।उधर कॉमेडियन से नेता बने भगवंत मान और इधर सिध्दू पाजी जब आगामी चुनावों में अपने -हास्य-परिहास का भरपूर प्रदर्शन करेंगे तो पंजाब की राजनीति में फिर से 'बल्ले-बल्ले 'की धूम होगी । अभी तो हालात  इतने बुरे हैं कि पंजाब में ''हंसना मना है ''! एसजीपीसी द्वारा 'संता -बंता 'चुटकुलों पर प्रतिबन्ध की मांग- सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान लेने से और अंदर-अंदर अलगवावाद-आतंकवाद की सुलगती आग ने न  केवल पंजाब  को बल्कि  पूरे भारत को ही ग़मों के महासागर में धकेल दिया है। श्रीराम तिवारी   

सोमवार, 23 मई 2016

'सनातन धर्म' एक अद्वतीय वैज्ञानिक जीवन दर्शन है।



यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य की ' विचार शक्ति' की महत्ता सर्वोपरि है। इसके दुरूपयोग से यदि इंसान हैवान या शैतान बन सकता है ,तो इसके सदुपयोग से इंसान दुनिया में इंसानियत का झंडा बुलंद कर सकता है। निसन्देह इस तथ्य की वैज्ञानिक स्थापना का श्रेय वैदिक मन्त्र दृष्टा ऋषियों को ही जाता है। सबसे पहले इन्होंने   ही  यह जाना कि मनुष्य अपने अवचेतन मन की वृत्तियों को पुन्जीभूत करके अन्य प्राणियों पर  काबू कर सकता है। भले ही इन ऋषियों ने 'विचार' और पदार्थ के उचित संयोग को 'यज्ञ'कहा हो,उससे उतपन्न ऊर्जा को दैवीय प्रसाद माना हो ,किन्तु यह परमसत्य है कि वैदिक ऋषियोंने ही सबसे पहले यह जानाकि वैचारिक ऊर्जा के द्वारा प्राकृतिक तत्वों के स्वभाव को और प्राणिमात्र के व्यवहार को  बदला जा सकता है।आर्य ऋषियों की इन खोजों को यदि तत्तकालीन कबीलाई मानवीय जीवन की आचार संहिता से नत्थी करदें तो वह 'वैदिक धर्म'का आधार कहा जा सकता है। जिसे कुछ लोग 'हिन्दू धर्म' कहते हैं,वह किसी एक व्यक्ति का 'इल्हाम'या 'बोध'नहीं है।और  यह किसी बर्बर कौम या यायावर कुटुंब-कबीले का हिंसक 'चाल -चरित-चेहरा' नहीं है।

वास्तव में यह तो एक सनातन परम्परा है। यह वैदिक दर्शन तो डार्विन के विकासवादी सिद्धान्त की तर्ज पर आर्यों - भारतीयों के वैज्ञानिक क्रमिक विकास को ही प्रस्तुत करता है। अद्वतीय वेदांत दर्शन के रूप में यह अन्य पंथ ,दर्शन,मजहब और आस्थाओं से अलहदा है। चूँकि यह क्रमिक विकास की लंबी परम्परा याने सनातन  से है इसलिए इसे 'सनातन धर्म' कहा जाता है । मेरा दावा है कि यह सनातन धर्म  एक अद्वतीय वैज्ञानिक जीवन दर्शन है।इसलिए यह न तो मार्क्स के शब्दों में 'अफीम 'है ,और न ही यह साम्यवाद के नजरिये से इसे अमानवीय कहा जा  सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ तथाकथित अवैदिक मत-पन्थ -दर्शन  भी केवल कुछ खास व्यक्तियों की निजी 'अहमन्यता ' का परिणाम हैं। इनमें से किसी ने  कुछ भी नया नहीं कहा। नए धर्म, पन्थ-दर्शन के नाम पर मनुष्य मात्र के समक्ष जो कुछ परोसा गया वह केवल शब्दों की बाजीगरी मात्र है। वेदों या सनातन धर्म से बाहर जो कुछ भी कहा गया है ,वह सब वैदिक वाङ्गमय में पहले से ही मौजूद था। सम्भवतः आदि शंकराचार्य ने यही सिद्ध करके अपनी 'आध्यात्मिक दिग्विजय'के झंडे सारे भारतीय उपमहाद्वीप में गाड़े होंगे ।

 चूँकि प्रकृति ,पदार्थ और चेतना के साहचर्य की महत्ता स्थापित करने वाले तथा  प्रकृति को मनुष्य के अनुकूल बनाने वाले वैदिक मन्त्रों की सर्जना में कहीं कोई दैवीय चमत्कार नहीं है। वेदमंत्रों ,उपनिषद सूत्रों ,आरण्यक-श्लोकों ,ब्राह्मण संहिताओं में कहीं किसी तरह की कोई अंध आस्थाके निशान मौजूद नहीं हैं। चारों वेदों ,तमाम उपनिषदों और वेदांत दर्शन में कहीं भी अमानवीयता या अवैज्ञानिकता नहीं हैं। वैदिक वाङ्गमय में पाषणयुग से लेकर पूर्व वैदिक काल तक की हजारों साल की लंबी आध्यात्मिक यात्रा का क्रमिक विकास दृष्टव्य है। वेशक पुराणों में बहुत घपला है किन्तु वेदांत दर्शन में तो  विशुद्ध मानवीय दर्शन और परा -मनोविज्ञान का ही पसारा है। मूलतः वेदांत दर्शन को ही समग्र हिन्दू धर्म  का सारतत्व कहा जा सकता है। कालांतर में रघुवंश ,यदुवंश और कुरुवंश जैसे सामन्तों की कुलीनता ने भी मानवीय मूल्यों के झंडे गाड़े हैं। यदि हरिश्चंद्र-तारामती का यह सब मिथ है

इस प्रक्रिया का आस्तिकता या नास्तिकता से कोई वास्ता नहीं है ।धर्म-मजहब ,ईश्वर-आत्मा से भी इसका कोई सरोकार नहीं है। यह मानसिक संवेदनाओं की ऊर्जा का उत्सर्जन है। और उसकी मशक्क्त का बहिर्जगत में प्राकट्य है। प्रायः हर जागरूक मनुष्य यह जानता है कि यदि वह अपने विचारों के संकेद्रण पर ध्यान दे तो उसके  विचार ही शब्द बन जाते हैं। मनुष्य यदि उन शब्दों पर ध्यान दे तो वे कर्म बन सकते हैं। याने कर्म का कारण शब्द है और शब्द का कारण 'विचार' है और 'विचार'का कारण मानव मस्तिष्क है।  विचार शक्ति से ही दुनिया में वैज्ञानिक क्रांति हुई है। विचार शक्ति से ही राजनैतिक -सामाजिक -सांस्कृतिक क्रांतियाँ सम्पन्न हुईं  हैं।  तमाम जेहादियों -धर्मांध पाखंडियोंने केवल और केवल  भ्रान्तियाँ भी उतपन्न कीं हैं। हिन्दू धर्म कोई मत-पंथ या मजहब नहीं है बल्कि एक वैज्ञानिक जीवन दर्शन है अपौरुषेय है।

विचार शक्ति का सिद्धांत जब नकारात्मक संदर्भ में सही हो सकता है तो सकारात्मक अर्थ में सही क्यों नहीं होगा ? बीसवीं शताब्दी के नाजीवादी -फासीवादी हिटलर का मंत्री गोयबल्स कहा करता था कि एक झूंठ को बार-बार बोलो वह सच में परिणित हो सकता है ! भारत में भी कुछ लोग हिटलर के अनुयायी हैं  , वे भी इस विचार शक्ति की नकारात्मक ऊर्जा का दुरूपयोग करते हुए राज्य सत्ता हासिल  करने में कामयाब हो रहे हैं। लेकिन उनका विनाश सुनिश्चित है। अंततोगत्वा सामूहिक जन चेतना की विचार शक्ति ही सहिष्णु और  धर्मनिरपेक्ष उदारवादी-जनवादी व्यवस्था के निमित्त  मानवता का सिंहनाद करेगी।

जो लोग धर्मनिपेक्ष भारत ,समाजवादी भारत ,खुशहाल भारत ,मजबूत भारत चाहते हैं ,उन्हें भीड़तंत्र को लोकतंत्र नहीं मान लेना  चाहिए ,बल्कि अपनी उत्कृष्ट विचार शक्ति की सामूहिक सकारात्मक ऊर्जा के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। इस विचार शक्ति को सिर्फ सार्वजानिक जीवन में ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत जीवन को भी  सदुपयोग करके जीवन को कुछ हद तक खुशहाल बनाया जा सकता है। यकीन न हो तो एक प्रयोग करके देखें ! सुबह से दोपहर तक झूंठ-मूठ ही सही रोज खुश रहने का नाटक करें ,आप पाएंगे कि  दोपहर बाद कोई आप को दुखी नहीं कर सकता ! श्रीराम तिवारी :-