हिन्दू धर्मशास्त्र और लोक परम्परा में 'बिघ्नहर्ता ' श्रीगणेश का गुणानुवाद केवल धार्मिक पूजा पाठ तक ही सीमित नहीं है. बल्कि 'हिन्दू समाज' में श्रीगणेश की वंदना एक सकारात्मक सक्रियता का द्वैतक है। जिस तरह एक सच्चा मुसलमान कोई शुभ कार्य करता है तो 'बिस्मिल्लाह रहमान रहीम ,,,,,''शुरूं करता हूँ खुद के नाम पर ,,,,उसकी रहमत के लिए'' ,,,,,इत्यादि अल्फाजों से प्रारम्भ करता है ,उसी तरह अधिकांस हिन्दू भी प्रत्येक शुभ और पवित्र कार्य प्रारम्भ करने से पहले '' श्री गणेशाय नमः '' का ससम्मान उच्चारण करते हैं। दरसल बिस्मिल्लाह रहमान रहीम ,,या ''श्री गणेशाय नमः '' जैसे पवित्र सूक्त वाक्य के स्मरण मात्र से ,कोई भी इंसान अमानवीय कर्म करने की सोच भी नहीं सकता ! इन मानवीय सूत्रों में धर्मांधता या साम्प्रदायिकता नहीं है। बल्कि असामाजिक कृत्य पर जो नियंत्रण 'राज्य का कानून' या दण्ड संहिता नहीं क्र सकती वो काम ये 'पवित्र सूक्त' करते हैं। ये मनुष्य को पशु बनने से रोकने की क्षमता रखते हैं।
श्री गणेश भगवान् की पूजा अर्चना तो सनातन से चली आ रही है ,किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत के स्वाधीनता संग्राम में जिस तरह बंगाल के साधुओं -काली भक्तों ने ब्रिटिश राज के खिलाफ 'दुर्गा पूजा' को विस्तार दिया ,उसी तरह महाराष्ट्र में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 'श्री गणेश पूजा' को विस्तृत रूप प्रदान किया। तब इन त्यौहारों के बहाने गुलाम भारत की जनता आत्मबल और जनशक्ति संचित किए करती थी। लेकिन आजादी के बाद इन त्यौहारों में चन्दा चोरी का की ,राजनीतिक स्वार्थ की और अनैतिक पाखण्ड की भरमार है। अब इन त्योहारों को नियंत्रित करने के लिए जनता को खुद ही सचेत होना चाहिए। विगत दिनों श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर जब 'मटकी फोड़' की उचाई और पार्टिसिपेंट की न्यूनतम आयु पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा निर्देश दिए तो राजठाकरे जैसे लोगों ने कोर्ट की अवमानना भी कर डाली। वैसे भी धर्म-मजहब तो व्यक्तिगत विषय है इसे सड़कों पर मनाना या इसके बहाने राजनीति करना दोनों ही अनैतिक हैं और धर्म को राजनीती में घुसेड़ना तो महापाप है। ये बात अलग है कि आज कल तो कुछ मुनियों,बाबाओं को राजनीती में ही भगवान दिख रहे हैं। श्रीराम तिवारी !

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