मंगलवार, 20 सितंबर 2016

एक राजनैतिक पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म में हीरो अनिल कपूर फ़िल्मी 'मुख्यमंत्री' अमरीश पूरी को सिस्टम की अनैतिकता पर बड़ा ओजस्वी भाषण देता है। अमरीशपुरी भी कटाक्ष करते हैं कि 'कहना आसान है ,सत्ता में आकर खुद करके दिखाओ तब पता चलेगा, कि सिस्टम के खिलाफ जानेमें कितना जोखिम है !' इस वार्तालाप के बाद अनिल कपूर याने 'नायक'को 'संवैधानिक विशेषाधिकार'के तहत एक दिन का मुख्यमंत्री बना दिया जाता है।

चूँकि अनिल कपूर रुपी 'एक दिन के बादशाह' को ईमानदार न्यायप्रिय जनता एवम परेश रावल रुपी निष्ठावान पीए का समर्थन  हासिल रहता है ,इसलिए फ़िल्मी कहानी का सुखान्त इस सन्देश के साथ होता है कि कितना ही बदनाम और खराब सिस्टम हो यदि  उस सिस्टम के अलमबरदारों को जूते मारो तो वो भी सुधर सकता है।और बिना किसी  रक्तिम क्रांति के २४ घंटे बीतनेसे कुछ क्षण पहले ही 'नायक' द्वारा तमाम भृष्ट अनैतिक आचरण वाले अफसर - नेता और मुख्यमंत्री भी जेल के सींकचों के अंदर कर दिए जाते हैं। मोदी जी याद रखें कि सत्ता सम्भाले हुए उन्हें ढाई वर्ष बीत चुके हैं ,लेकिन अभी तक एक भी किसी बड़े स्केम वाले  भृष्ट नेता -अधिकारी का बाल भी बांका नहीं  हुआ है । स्विस खातों से एक पैसा नहीं आया है और पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों पर रंचमात्र लगाम  नहीं कस पाए हैं। बल्कि मोदी सरकार की एकमात्र उपलब्धि यह है कि अम्बानियों-अडानियों के तो वारे-न्यारे हैं और पाकिस्तानी हुक्मरान आये दिन आतंकियों के बहाने भारत के सैनिकों को गाजरमुली की तरह काट रहे हैं। कभी पठाकोट,कभी उधमपुर और कभी उरी केम्प में हमारे सैनिक  बेमौत  क्यों मारे जा रहे हैं ? क्या यही अच्छे दिनों का प्रमाण है ?

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