बुधवार, 14 सितंबर 2016

ये लातों के भूत हैं बातों से नहीं मानेंगे !'


अलगाववादी आतंकी बुरहान बानी के मारे जाने के बाद ,कश्मीर में पाक परस्त अलगाववादियों ने कोहराम मचा रखा है।  जम्मू -कश्मीर की भाजपा समर्थित महबूबा मुफ्ती सरकार जब इन बदमाश पत्थरबाज दहशतगर्दों को नियंत्रित  करने में असफल रही और  पाकिस्तान ने  जब इस स्थिति पर मगरमच्छ के आंसू यूएनओ में बहाये तो भारत के विरोधी दलों ने इस समस्या को गंभीरता से लिया। उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कश्मीरकी ओर  देखा। इतना अहि नहीं सांसदों का सर्व दलीय प्रतिनिधिमंडल खुद कश्मीर गया। लेकिन खेद की बात है कि हुर्रियत के नेताओं ने इस प्रतिनिधि मंडल से बात नहीं की। गुलाम गिलानी,उमर मलिक और अन्य हुर्रियत नेता अपनी-अपनी ऊँची अटरियों से इस प्रतिनिधिमंडल को दूर से निहारते रहे।

वैताल रुपी कश्मीरियत,जम्हूरियत और इंसानियत का शव अपने कन्धों पर लादकर विक्रम रुपी सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल  वैरंग वापिस दिल्ली लौट आया। राजनैतिक इतिहास में इतना अपमान तो  शायद शीत युद्ध के दौरान किसिंगर या ग्रोमिको का भी नहीं हुआ होगा।  इस घटना से कश्मीर विषयक प्रशासनिक विफलताओं की आलोचना भी थम गयी। मुख्यमंत्री  महबूबा मुफ्ती और प्रधानमंत्री  मोदी जी  दोनों को राहत की संजीविनी मिल गयी।  स्टेट पक्ष को  यह कहने का अवसर  भी मिल गया कि 'देखा -हमतो कबसे कह रहे थे कि ये पत्थरबाज केवल लातों के भूत हैं  और बातों से नहीं मानेंगे !'

जहाँ तक  हुर्रियत द्वारा सर्वदलीय सांसदों के प्रतिनिधि मंडल के अपमान का सवाल है ,तो उसके लिए 'अब्दुल रहीम  खान-ए खाना 'पहले ही जाता गए हैं कि :-

''केहिं की महिमा न घटी ,पर घर गए रहीम।

 अच्युत चरण तरंगणी  ,गंग नाम भव  धीम।। ''         [ श्रीराम तिवारी ]

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