रविवार, 27 नवंबर 2016

संघर्षमें शामिल सभी साथियोंको -नमन

''भारत बन्द'' तो विगत ८ नवम्बर से ही जारी है। आज २८ नवम्बर को तो केवल 'जबरा मारे और रोने न दे '' वाली  कहावत ही  चरितार्थ हो रही है। कालेधन वाले हरामखोर बदमाश -तक्षक नाग अपने बिलों में छुपकर काले को सफ़ेद कर चुके हैं। चूँकि उनकी बीसों घी में हैं इसलिए भारत बन्द विरोध कर रहे हैं। नोटबंदी का समर्थन करने यदि उन घरों में जाएंगे जहाँ नोटबंदी के कारण मौतें हुईं हैं, तो शायद उनकी आत्मा में इंसानियत जाग उठेगी।  

  जिनके पास संपत्ति के रूप में केवल अपना खून-पसीना है ,जो मेहनतकश नर-नारी गरीबी में भी अपना ईमान नहीं छोड़ते ,जो किसी भी तरह के अन्याय को सहन नहीं करते , जो सच्चे देशभक्त हैं ,जो शासकों की सनक को देश के लिए खतरा मानते हैं, जिन्हें लगता है कि नोटबंदी के कारण कालाधन सरकार के हाथ नहीं आया, किन्तु ईमानदार जनता अवश्य परेशान हो रही है, ऐंसे जावाँज देशभक्त लोग आज  'विमुद्रीकरण 'की खामियों का और उसकेलिए जिम्मेदार नेता का पुरजोर विरोध कर रहे हैं ! इस संघर्षमें शामिल सभी साथियोंको -नमन !श्रीराम !  

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

संसद की अवमानना करने वालों को बेनकाब किया जाए !


 प्रगतिशील विचारकों - दार्शनिक सिद्धान्तकारों के अनुसार 'व्यक्ति -विशेष' की बनिस्पत ' विचार विशेष ' की महत्ता ही श्रेष्ठ है। इतिहास गवाह है जब-जब किसी 'व्यक्ति विशेष' को समाज या राष्ट्र से ऊपर माना गया, तब-तब मानव समाज ने बहुत धोखा खाया है। किसी 'व्यक्ति विशेष' के पक्ष -विपक्ष के कारण ही दुनिया में दो बड़े महायुद्ध हो चुके हैं।  भारत जैसे देश को तो इसी व्यक्ति केंद्रित सोच के कारण सदियों की गुलामी भोगनी पड़ी !दुनिया की जिस किसी कौम ने ,राष्ट्र ने, 'विचारधारा की जगह किसी व्यक्ति विशेष' को 'अवतार' या 'हीरो' माना  उस देश और समाज की बहुत दुर्गति हुई है।

जिस किसी प्रबुद्ध कौम या राष्ट्र ने 'व्यक्ति विशेष' की महत्ता के बजाय उसके द्वारा प्रणीत श्रेष्ठ 'मानवीय मूल्यों' को अर्थात ''विचारों' को  महत्व दिया ,उस कौम या राष्ट्र ने अजेय शक्ति हासिल की। व्यक्ति की जगह मानवीय मूल्य , मानवोचित विचार और विवेक को महत्व देने के कारण ही अंग्रेज जाति ने सैकड़ों साल तक अधिकांस दुनिया पर राज किया है। जबकि अपने तानाशाह शासक नेपोलियन की जय- जयकार करने वाली फ़्रांसीसी जनता को एक अंग्रेज जनरल 'वेलिंग्टन' के सामने शर्मिंदा होना पड़ा। इसी तरह हिटलर की जयजयकार करने वाले जर्मनों की नयी पीढी को उनके पूर्वजों का अंतिम हश्र ,आज भी शर्मिंदा करता है। जनरल तोजो की हठधर्मिता के कारण ही हिरोशिमा और नागाशाकी का भयानक नर संहार हुआ था, जिसका नकारात्मक असर आजभी जापानकी जनता  पर देखा जा सकता है। जो कौम या राष्ट्र इतिहास से सबक नहीं सीखते उनका वजूद हमेशा खतरे में रहता है !

कल्पना कीजिये कि घोड़े के पैर में लोहे की नाल ठुकती देख ,मेंढक भी नाल ठुकवा ले तो क्या होगा ? नाई को हजामत बनाते देख कोई बंदर भी उस्तरा चलादे तो क्या होगा ? सोचिये कि यदि कोई भारतीय नेता आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ,किसी पूर्ववर्ती सामंतयुगीन तानाशाह या बीसवीं सदी के बदनाम 'डिक्टेटर' की नकल करने लगेगा तो क्या होगा ? सदन का नेता और देशका प्रधानमंत्री किसी प्रासंगिक एजेंडे पर संसद में बयान देने के बजाय उसी विषय पर कभी मथुरा ,कभी आगरा और कभी बठिंडा की आम सभा में भाषण देते रहेंगे तो यह सरासर लोकतंत्र का अपमान होगा  !निश्चय ही यह तुगलक बनने की अपवित्र चेष्टा कही जाएगी ! यदि संसद का अनादर होगा तो लोकतंत्र कैसे जीवित रह सकता है ? चूँकि समाजवाद के लक्ष्य की पूर्ती के लिए  लोकतंत्र रुपी धनुष और सर्वहारा वर्ग की एकजुटता का बाण जरूरी है इसलिए लोकतंत्र की सर्वोच्च शक्ति याने भारतीय संसद की गरिमा को अक्षुण बनाये रखना जरुरी है।  संसद की अवमानना करने वालों को बेनकाब किया जाए !

 चूँकि एनडीए सरकार की 'नोटबंदी' योजना का 'जापा' बिगड़ चुका है। विपक्ष को  इस पर 'भारत बंद' करने की कोई जरूरत नहीं है। देश की जनता खुद समझदार है और यदि उसे इस योजना से बाकई हैरानी -परेशानी है या कष्ट हुआ है तो वह ही खुद निपट लेगी। देशके राजनैतिक विपक्ष को इस नोटबंदी पर आइंदा ज्यादा ऊर्जा बर्बाद करने के जरूरत नहीं है। इसके बजाय एकजुट होकर ,प्रधानमंत्री द्वारा लगातार की जा रही संसद की अवमानना पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। इसके लिए 'बहरत बंद' नहीं बल्कि देशभर में एक दिनका सामूहिक उपवास या भूंख हड़ताल का सर्वसम्मत प्रोग्राम बनाना  चाहिए ! देश की आवाम को संसदीय लोकतंत्र के खतरों से अवगत  कराया जाना चाहिए। वेशक इस 'नोटबंदी' से लगभग सौ निर्दोष जाने गयीं हैं, किन्तु यह भी सच है कि आतंकवाद ,नक्सलवाद , कालेधन पर कुछ तो असर हुआ है। 'अच्छे दिनों' की आशा में देश की जनता तकलीफ  उठाकर भी इन तत्वों को निपटानेके मूडमें है। इसलिए नोटबंदी पर अब ज्यादा तरजीह देनेकी जरूरत नहीं है।  

हालाँकि यह खेदजनक है कि  भारत की अधिकांस जनता इन दिनों एक खास 'व्यक्ति' के भरोसे है। जैसे सिकंदर के आक्रमण के समय पौरुष के भरोसे रहे ,जैसे  मुहम्मद बिन कासिम के हमले के वक्त दाहिरसेन के भरोसे रहे जैसे मुहम्मद गौरी के हमले के समय पृथ्वीराज चौहान के भरोसे रहे ,जैसे बाबर के हमले के समय राणा सांगा के भरोसे रहे , जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी की तिजारत के समय सिराजुददौला -मीरकासिम के भरोसे रहे जैसे अंग्रेजों के आक्रमण के समय बहादुशाह जफर के भरोसे रहे ,वैसे ही इन दिनों भारत की आवाम का एक खास हिस्सा नरेद्र मोदी  के भरोसे है। तो दूसरा हिस्सा भी केवल उनकी आलोचना में ही व्यस्त है। नीतियों-कार्यक्रमों पर अभी बहुत कम बात हो रही है। श्रीराम तिवारी !

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

का वर्षा जब कृषि सुखाने। समय चुके पुनि का पछताने।। ''

नोटबंदी के कारण इतनी सारी मौतें हो जाने के बाद ,निरीह जनता की करोड़ों बेबस आँखों से गंगा-जमुना बह जाने के बाद , नोटबंदी योजना में लगातार संशोधन रुपी सैकड़ों थेगड़े लग जाने के बाद ,डॉ मनमोहनसिंह उर्फ़  'मौनी बाबा' अब जाकर राज्य सभा में बोले हैं ! जो व्यक्ति १० सालतक देश का प्रधानमंत्री रहा हो और जिसकी  रहस्यमय 'चुप्पी' के कारण जुमलेबाजों को सत्ता नसीब हुई हो, जो सन्सार के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में से एक हो , जो विश्वबैंक का डायरेक्टर और अंतर्राष्टीय मुद्राकोष का सलाहकार रहा हो -उसका इस तरह देर से मुखर होना किस काम का ?  गोस्वामी तुलसीदास जी बाबा शायद इन्ही के लिए कह गए हैं -'' का वर्षा जब कृषि सुखाने। समय चुके पुनि का पछताने।। ''  For more reading please visit on www.janwadi.blogspot.com

यदि आप दूसरों के सतत सहयोगी बने रहेंगे तो !


यदि आप  वरिष्ठजनों ,सुह्रदयजनों और अभिभावकों के प्रति कृतज्ञता भाव रखते हैं तो आप को नैसर्गिक रूप से तत्काल ख़ुशी प्राप्त होगी। ज्यों ही आप नकारात्मक विचार तरंगों को प्रतिबंधित करते हैं ,अपना मन अनावश्यक मुद्दोंसे हटाकर उसे प्रकृति दर्शन ,आत्मदर्शन की ओर ले जाते हैं ,अथवा किसी के हितका विचार धारण करते हैं, खुशी की लहर तुरन्त दौड़ी चली आती है। छोटे -छोटे बच्चों की किलकारियों ,सितारों से सजी चांदनी रात और किसी मनोअनुकूल स्वजन से सहज वार्तालाप निश्चय ही सतत ऊर्जावान बनाते हैं। यदि आप किसी भी कार्य को करने से पहले यह देख लें कि वह अनैतिक तो नहीं है ,वह किसी अन्य के अहित का कारण तो नहीं बनेगा और उसे करने से किसी का कुछ लाभ है या नहीं ,तभी आप उस कार्य को करें। अन्यथा 'उससे बेहतर तो 'अकर्म 'की स्थिति ही उचित है। इस तरह जब आप निर्भीक होकर ख़ुशीमन से कोई कार्य करते हैं तो आपको गुणात्मक रूप से अनन्य ख़ुशी मिलती है। यदि आप खुशमिजाज रहेंगे ,दूसरों के सतत सहयोगी बने रहेंगे तो स्वाभाविक रूप से सर्वप्रिय बने रहेंगे। इस तरह आप अपने मन को  स्थिर करने में भी सफल हो सकते हैं,जो विपश्यना ,ध्यान और योग इत्यादि में मददगार सावित होगा। खुशमिजाज व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवनमें तो सफल होता ही है,किन्तु उसका सार्वजनिक जीवन भी भव्य और खुशहाल हो जाता है। वह दुःख ,क्लेश और अभाव में प्रशांतचित्त होकर चुनौतियों का सामना करता है। ऐंसा व्यक्ति भले ही अनीश्वरवादी ही क्यों न हो वह भौतिक,आध्यात्मिक और सर्व - सामाजिक  जीवन भी अक्षुण बनाता हैं । श्रीराम तिवारी !

रविवार, 20 नवंबर 2016


 इंदौर से हर सोमवार को निकलने वाला 'सकारात्मक सोमवार' का आज २१ नवम्बर [सोमवार] का अंक सामने है। इसका प्रथम पृष्ठ पूरा पढ़ने का माद्दा मुझमे नहीं है। जिसमे पूरा पेज पढ़ने की हिम्मत हो वह बड़ा जिगरवाला है  ! पुखरायाँ के समीप हुई भीषण रेल दुर्घटना की मार्मिक रिपोर्ट में उसका  सचित्र वर्णन, १०० से ऊपर दर्दनाक मौतें, सैकड़ों मरणासन्न - घायल , दर्दनाक चीख पुकार इसमें सब कुछ नकारात्मक और मर्मान्तक है ! हे नरेंद्र !हे प्रभु  ! इस देश पर रहम करो !

 इधर भारत के सत्ताधारी नेता जुमलेबाजी में ,जनता को परेशान करने या भरमाने की जद्दोजहद में जुटे हैं ,उधर   तुर्की का राष्ट्रपति एर्दोगान पाकिस्तान आया और पाकिस्तानी संसद में भाषण देकर चला गया। इस भाषण में एर्दोगान ने कश्मीर के सन्दर्भ में पाकिस्तान की कारिस्तानी का समर्थन किया है और भारत के हितों पर खुल्लम -खुल्ला चोट की है ,भारत के नकली 'राष्ट्रवादी' नेता ,उनके 'चारण - भाट और लोभी लालची स्वामी -बाबा लोग केवल विपक्ष को गरियाने में  जुटे हैं !

शनिवार, 19 नवंबर 2016


नोटबंदी अथवा सरकार के किसी अन्य नीतिगत फैसले से यदि जनता को या बैंक वालों को कोई तकलीफ होती है ,यदि लोग  मरने लगते हैं तो इसमें सरकार का कोई असुर नहीं। धार्मिक व्याख्या के अनुसार सभी प्राणी अपने -अपने किये का फल भोग रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी भी अपने रामचरितमानस में यही  कह गए हैं:-

''कोउ न काउ सुख दुखकर दाता। निजकृत कर्म भोग सब भ्राता।।

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मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक याने नोटबंदी के इस 'महायज्ञ' में जो लोग स्वाहा हो रहे हैं, वे जब तक कतार में खड़े थे तब तक देशभक्त थे [राम माधव और राजनाथसिंह के अनुसार] जब ये देशभक्त कतार में खड़े -खड़े मर गए तो सत्ताधारी लोग इन दिवंगतों को शहीद  मानने से इनकार कर रहे है। नेता और मंत्री इन मौतों पर व्यंगात्मक टिपण्णी करे रहे हैं कि जनता को कोई परेशानी नहीं ! क्या यही लोकतंत्र है ? क्या  यही इंसानियत है ?

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

सरकार ने होम वर्क नहीं किया !


केंद्र सरकार की 'नोटबंदी' योजना से आरबीआई के पास अरबों रूपये पुराने नोटों की शक्ल में जमा हो चुके हैं !इस योजना के लागु होने से सरकार के खजाने में जमा हुई करेंसी में कितना कालाधन जमा हुआ यह तो सरकार ही जाने ,किन्तु इस आपाधापी में जो सैकड़ों जाने गईं हैं, उनमें  कालेधन वाला 'देशद्रोही' शायद एकभी नहीं था।   मोदी जी को मालूम हो कि उनकी इस नोटबंदी से एक नया आपराधिक समाज पैदा हो गया है। कमीशनखोर नए दलाल-भृष्ट बैंक कर्मचारी -अधिकारी और 'अदृष्यजगत' के बेईमानों ने आपण कालाधन सुरक्षित कर लिया है।   ईमानदार और बेकसूर लोग सरकार कीआधी अधूरी तैयारी और 'कुनीति' के कारण लाइन में लगे-लगे मरे हैं या मर रहे हैं। क्या उन्हें 'शहीद' का  दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए ? क्या उन्हें मरणोपरान्त वही सम्मान नहीं मिलना चाहिए जो देश के लिए जान देनेवालों को दिया जाता है?

सरकार और उसके चाटुकारों का ढपोरशंखी रवैया न जाने कितनी और जाने लेगा ? सरकार ने अपनी नोटबंदी पर इतने तदर्थ पैबन्द याने थेगड़े लगाये कि आज कोलकाता उच्च न्यायालय को भी कहना पड़ा कि '' सरकार ने होम वर्क नहीं किया'' । केवल ढींगे हाँकने या कोरी लाठी पीटने से साँप नहीं मरते। अभी तक एक भी कालेधन वाला मगरमच्छ तो क्या छटाक भर की मछली भी नहीं पकड़ सके हैं । बड़े आश्चर्य की बात है कि नोटबंदी बनाम 'मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक' पर सरकार और उसके 'चमचों' को बिखरे हुए विपक्ष का भौंथरा विरोध भी सहन नहीं हो रहा है। यदि इस नोटबंदी  का मकसद कश्मीरी पत्थरबाजों को नसीहत देना था तो पूरे देश को दाँव पर क्यों  लगाया ?  यदि इस मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक का मकसद ,पाकिस्तान में छपने वाली नकली करेंसी को रोकना है तो यह बात तो सबको मालूम है कि पाकिस्तान की आईएसआई नकली भारतीय मुद्रा छापकर भारत में खपाती है , यह खबर पूरी दुनिया को वर्षों से मालूम है , क्या यह बात शरीफ के घर चाय पीते वक्त मोदी जी भूल गए थे ?