नोटबंदी अथवा सरकार के किसी अन्य नीतिगत फैसले से यदि जनता को या बैंक वालों को कोई तकलीफ होती है ,यदि लोग मरने लगते हैं तो इसमें सरकार का कोई असुर नहीं। धार्मिक व्याख्या के अनुसार सभी प्राणी अपने -अपने किये का फल भोग रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी भी अपने रामचरितमानस में यही कह गए हैं:-
''कोउ न काउ सुख दुखकर दाता। निजकृत कर्म भोग सब भ्राता।।
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मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक याने नोटबंदी के इस 'महायज्ञ' में जो लोग स्वाहा हो रहे हैं, वे जब तक कतार में खड़े थे तब तक देशभक्त थे [राम माधव और राजनाथसिंह के अनुसार] जब ये देशभक्त कतार में खड़े -खड़े मर गए तो सत्ताधारी लोग इन दिवंगतों को शहीद मानने से इनकार कर रहे है। नेता और मंत्री इन मौतों पर व्यंगात्मक टिपण्णी करे रहे हैं कि जनता को कोई परेशानी नहीं ! क्या यही लोकतंत्र है ? क्या यही इंसानियत है ?

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