मंगलवार, 31 जनवरी 2017

बजट सत्र शुभारम्भ


परंपरानुसार वर्तमान बजट सत्र में भी महामहिम राष्ट्रपति का अभिभाषण सम्पन्न हुआ। राष्ट्रपतिजी ने सदन के दोनों सदनों को संयुक्त रूप से सेंट्रल हाल में संबोधित किया। उनके भाषण का सारतत्व वही है जो 'भाइयो- -बहिनों' के चहेते पीएम और वित्त मंत्री जेटली जी के जेहन में समाया हुआ है। कुल मिलाकर फिर वही आसमान से तारे तोड़ने वाला , 'फीलगुड' और शाइनिंग इंडिया वाला बजट आने वाला है।

  किन्तु आज के अभिभाषण की प्रस्तुति निहायत ही नीरस और उबाऊ रही। महामहिम ने पानी पी-पीकर ,खाँस -खाँसकर,अटैक-अटकर जैसे -तैसे अद्भुत आंग्ल भाषा में अपना अभिभाषण पूरा किया। राष्ट्रपतिजी के अंग्रेजी अभिभाषण का हिंदी अनुवाद उपराष्ट्रपति हामिद अंसारीजीने प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रारम्भ का एक पैरा और अंत का आधा पैरा ही पढ़ा।  बाकी का सम्पूर्ण अभिभाषण स्वतः पढ़ा हुआ मान लिया गया। उपराष्ट्रपति के उच्चारण आलम यह था कि एक भी शब्द स्पष्ट सुनाई नहीं  दिया।

बजट सत्र शुभारम्भ को देख-सुनकर अनुभूत हुआ कि भारतीय लोकतंत्र के उच्चतम पदों पर विराजित व्यक्तियों को यदि अंग्रेजी ज्ञान है तो बहुत अच्छा। किन्तु हिंदी का ज्ञान नहीं तो बंटाढार ! कहने को तो हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, किन्तु सर्वोच्च पदों पर ऐंसे लोगो को बिठा देते हैं जो पहली कक्षा की हिंदी भी ढंग से नहीं बोल पाते। अंग्रेजी का उच्चारण तो और भी तकलीफदेह  रहा । महामहिम अंग्रेजी में पढ़ रहे थे तो ऐंसा लग रहा था मानों बाँग्ला में अभिभाषण पढ़ रहे हैं। अंत में जनाब उप महामहिम अंसारी जो हिंदी बोले उस सुनकर हम सिर धुनि-धुनि पछताए। अपने आपसे कहा - ''हिंदी तेरी अकथ कहानी, भाषण में नीरसता और नयनों में पानी !

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

मानवता को किस से खतरा है ?


दक्षिण भारत से एक साथ दो विरोधी खबरें आ रहीं हैं। एक तरफ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पन्नी सेल्वम ने विधान सभा में सप्रमाण वक्तब्य दिया है कि 'जल्लीकुट्टू' के समर्थकों की भीड़में कुछ 'अराजक'तत्व घुस आये थे जिनके पास लादेन के फोटो थे ! सोशल मीडिया पर जब प्रगतिशील -शांतिकामी लोगों ने जल्लीकुट्टू का विरोध किया था तब कुछ अहमक 'देशभक्तों' ने तमिल परम्परा और संस्कृति का वास्ता देकर जल्लीकुट्टू का समर्थन किया था। सवाल उठता है कि बेजुबान पशुओं को सताने वाली संस्था  'पेटा' यदि विदेशी विचारधारा है तो 'फासीवाद' और 'नाजीवाद' कौन सी वैदिक विचारधारा है ? मानवता को किस से खतरा है ? पेटा से ,'अहिंसा सिद्धान्त' से या लादेन वादियों से या जल्लीकुट्टूवादियों से ? जल्लीकुट्टू के अंधसमर्थकों ने जानवरोंकी हमदर्द संस्था 'पेटा'को विदेशी विचारधारा बताकर  उसे भारत छोड़ने की मांग की है। क्या पशुओं को सताना भारतीय परम्परा है ? यदि हाँ !तो जल्लीकुट्टू में लादेनवादियों का होना भी लाजिमी है! क्योंकि इन आतंकियों को तो हर प्राणी को सताने में मजा आता है। जल्लीकुट्टू समर्थक और लादेन समर्थक जब एक हैं तो देशभक्त वुद्धिजीवियों का दायित्व है कि केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार की कारगुजारी का पर्दाफास करें !

 


कल तक जो मेघालय के राज्यपाल हुआ करते थे ,अब वे पदमुक्त होकर शीघ्र ही गोविंदाचार्य,सुरेश जोशी  , आसाराम,नित्यानन्द इत्यादि कामुक हिंदुत्ववादियों की सूचीको सुशोभित करने जा रहे हैं ! जय षणमुगनाथन !


'संघ' पृष्ठभूमि से तराशे गए व्यक्तियों का चाल चरित्र चेहरा यदि वी षणमुगनाथन जैसा है तो इसमें अप्रत्याशित क्या है? श्री कृष्ण की 'रासलीला' के बहाने आसाराम जैसे गुरु घंटालों ने संघियों को यही तो सिखाया है ! कहाँ हो बाबा रामदेव,? लोकपाल के प्यारे -अन्नाहजारे तुम कहाँ हो ?हे भारत भाग्य विधाता चरित्र निर्माता तुम कहाँ हो ?  

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

आरोप लगाते समय कद का भी ध्यान रखा जाये



राहुल गाँधी ने गुजरात में जाकर आरोप लगाया है कि गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'सहारा समूह' से ५० करोड़की घूस  खाई !  शुक्र है कि 'पीएम' मोदीने कोई घूस नहीं ली ! राहुलने जो आरोप लगाया है उससे भाजपा और मोदी जी की तौहीन हुई है। क्योंकि भाजपा ने विगत तीन साल में लगभग तीन लाख करोड़ नहीं जुटाए तो क्या ख़ाक किया ? राहुल जी देश भर में सिर्फ पचास करोड़ का झुनझुना बजाते फिर रहे हैं। इतने रुपयों में तो मायावती की एक आमसभा भी नहीं हो सकती।इतने रूपये तो ममताके ड्राइवरकी सीटके नीचे निकल आएंगे !  इतनी रकम से तो भाजपा गुजरात की एक सीट का चुनाव भी नहीं जीत सकती। आरोप लगाते समय भाजपा की हैसियत और उसके कद का ध्यान रकह जाना चाहिए ! आखिर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है उसकी कद्र भी तो कोई चीज है ? इतना बड़ा कुनबा और सिर्फ ५० करोड़ का आरोप ! ये सरासर नाइंसाफी है ! दिल्ली मुबई सूरत गुजरात में तो चायवाला ,भजिएवाला, गोबरवाला भी दस हजार करोड़ से कम नहीं 'हग' रहा है ! दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधान मंत्री ऐसे ही नहीं बन गए मोदी जी !आरोप लगाते समय कद का भी ध्यान रखा जाये !

राहुल गाँधी ने 'सहारा' की जिस सूची का खुलासा किया है उसमें लगभग १०० राजनैतिक पार्टियों का उल्लेख है। ख़ुशी  की बात यह है कि इस सूची में वामपंथ अथवा सीपीएम का नाम नहीं है। चन्दाचोर राजनेताओं और भृष्ट पूँजीवादी पार्टियों को उजागर करने में राहुल गाँधी ने जो सहयोग दिया उसके लिए उन्हें साधुवाद,,! यह बात काबिल ऐ गौर है कि उस सूची में कांग्रेस का भी नाम है ,भले ही उसे कम चन्दा मिला होगा !

राहुल गाँधी के आरोप पर केंद्रीय मंत्री रविशंकरप्रसाद ने कहा है कि पीएम मोदीजी तो 'गंगा मैया' की तरह परम् पवित्र हैं। उनके इस द्विअर्थी सूक्त का भाष्य जरुरी है। एक अर्थ तो सीधा-सीधा है कि मोदीजी उस गंगा की तरह पवित्रहैं जो पुराण अनुसार हजारों साल पहले राजा भगीरथ पृथ्वी पर लायेथे ! लेकिन दूसरा अर्थ वह वास्तविकता दिखा रहा है कि कानपुर , बनारस से लेकर पटना कोलकाता सभी जगह मरे हुए ढोर ,अधजली लाशें , सड़े -गले फूलों का सैलाब - निर्माल्य और गंदगी से 'गंगा मैया' बजबजा रही है। सिर्फ गंगा की ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत की भी यही तस्वीर है। इस बदरंग तस्वीर से मोदी जी की तुलना रविशंकर प्रसाद ने  की है तो बाकई कहना पड़ेगा कि वे विद्वत्ता के उच्च शिखर पर हैं। उन्हें कोटि-कोटि बधाई !

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

नास्तिक -आस्तिक एक ही सिक्के के दो पहलु !

 जिस तरह भारतीय वेदांत दर्शन में सगुन-निर्गुण  की मतभिन्नता और किंचित वस्तुनिष्ठ साम्य भी है  उसी तरह समस्त सभ्य संसारमें आस्तिक-नास्तिक का भेद भी निर्वर्चनीय है।यदि आप आस्तिक हैं तो अच्छी बात है लेकिन मेहरवानी करके अंधश्रद्धा,साम्प्रदायिकता और धार्मिक पाखण्ड से बचें ! यदि आप नास्तिक हैं तो बहुत अच्छी बातहै किन्तु आप सत्य,नैतिकता,संविधान,मानवीय अनुशासन और न्याय के पक्ष का मजबूती से अनुपालन करें !चूँकि आपको यकीनहै कि आप बिना किसी ईश्वरीय सत्ता के सांसारिक चुनौतियों का मुकाबला खुद कर सकते  हैं ,आप महान हैं क्योकि आपको जो कुछ भी करना है सब अपने  मानवीय बुद्धिबल के बूते पर ही करना है।

आस्तिक बनाम नास्तिक का द्वंद और उसकी चर्चा सदियों पुरानी है। पाषाण युग का मुनष्य जब गिरी कन्दराओं में रहता था, तब मूलतः वह न तो नास्तिकथा और न ही वह आस्तिकथा। तब वह अन्य देहधारियों की भाँति सिर्फ थलचर था। जहाँ-जहाँ धरती की जैविक तासीर मनुष्य की जिजीविषा के अनुकूल मिलती गयी ,मानव सभ्यता का वहाँ -वहाँ झंडा लहराने लगा। मनुष्य ने ज्यों ही पैरों पर चलना सीखा और आग का उपयोग सीखा और पहिये का आविष्कार किया त्यों ही उसकी मेधा शक्ति को पंख लग गए। जल्दी ही मनुष्य ने पत्थर के नुकीले हथियार और अन्य प्राणियों को काबू में करने के साधन खोज लिये। आग, पानी,हवा,पेड़-पौधे और पालतू पशुओं की खोज ने मनुष्य को 'नदी-घाटी'सभ्यताओं कीओर गतिशील बना दिया। जहाँ मनुष्य ने कबीलाई समाज में जीना प्रारम्भ किया। यों तो दुनिया भर के समाजों की भाषा,संस्कृति सभ्यता और व्यवस्था के क्रमिक विकास का इतिहास जुदा -जुदा है किन्तु आस्था-अनास्था का द्वंद सभी में एक समान रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप में उत्तर वैदिक काल से ही 'वेदमत' और 'लोकमत' का सतत संघर्ष चलता आ रहा है।

ज्ञान क्या है ? अज्ञान क्या है ? ईश्वर क्या है ? ब्रह्म क्या है ? जीव क्या है ? माया क्या है ? दुःख-सुख का कारण क्या है ? सृष्टि कर्ता कौन है ? मनुष्य को किसकी आराधना करनी चाहिए ? वेद को मानने और तदनुसार यज्ञ उपासना करने वाले को आस्तिक क्यों कहा गया ?और वेदविरुद्ध लोकमतावलम्बी  को नास्तिकक्यों कहा गया ?इन प्रश्नों के उत्तर और विपरीत मतों के द्वंदका यह सिलसिला हजारों साल पुराना । आस्तिक मतावलंबियों का धृढ़ विश्वाश है कि अच्छा और सुखी जीवन जीनेके लिए 'आस्तिक'होना जरूरी है। नास्तिक मत का  विश्वाश है कि मनुष्य भी   धरती के अन्य प्राणियों जैसा ही कुदरती सृजन है। जिस तरह पेड़-पौधों,पशुओं,थलचरों,जलचरों,नभचरों और मानव शिशुओं को आस्तिक-नास्तिक से कोई सरोकार नहीं ,उसी तरह 'मनुष्य योनि'को भी इस बात से कोई मतलब नहीं कि आस्तिक क्या है और नास्तिक क्या है ?

पाश्चात्य नास्तिकों और भारतीय चार्वाक दर्शन के अनुयायियों का सवाल जायज है कि  जब मनुष्य के अलावा
हाथी ,कंगारू,ऊंट ,घोडा गधा, गाय बैल भैंस कुत्ता  ,बिल्ली ,शेर ,साँप ,नेवला ,मयूर ,कोयल ,कौआ,तीतर, तोता , गिद्ध -बाज मगरमच्छ,कछुआ और मछली आस्तिक-नास्तिक नहीं होते तो मनुष्य को आस्तिक-नास्तिक के फेर में क्यों पड़ना चाहिए ? चूँकि आस्तिक-नास्तिक का वर्गीकरण मनुष्य के सिद्धांतों-नियमों से संचालित है अतः यह 'ईश्वर' कृत व्यवस्था नहीं है । यदि यह ईश्वरकृत व्यवस्था होती तो,ईश्वर ऐंसा अन्याय नहीं कदापि नहीं करता कि यह सौगात सिर्फ मनुष्य योनि के हवाले कर देता। अति उन्नत सूचना संचार क्रांति से युक्त २१वीं शताब्दी में भी अधिकांस दुनिया स्वाभाविक रूप से नास्तिक ही है। दक्षिण अफ्रीकी कबीलों में और भारत के सुदूरवर्ती क्षेत्रों के आदिवासियों को इससे कोई मतलब नहीं कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक !

चार्वाक से भी पहले भारतीय प्राच्य दर्शन श्रंखला में 'नास्तिक दर्शन' का उल्लेख बालमीकि रामायण में मिलता है।
चित्रकूट में जब अनुज भरत की याचना को न मानकर श्रीराम ने ,गुरु वशिष्ठ और माताओं को वापिस विदा किया


आमतौर पर अर्धशिक्षित भारतीय युवावर्ग और खासतौर से धर्म-मजहब का घृणास्पद गटर साहित्य पढ़ने वाले साम्प्रदायिक तत्व और अंधराष्ट्रवादी नेताओं की दूषित भाषणबाजी का नित्य प्रातः सेवन करने वाले कूड़ मगज - मंदमति लोग यह मानते हैं कि कम्युनिस्ट अर्थात वामपंथी तो नास्तिक होते हैं। उनके मतानुसार जिस किसी ने अपने हाथोंमें 'हँसिया हथौड़ा' वाला ' लाल झंडा' उठा लिया समझो वह 'नास्तिक'है। उनकी नजर में यदि किसी ने गलतीसे भी 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा लगा दिया तो समझो वह 'देशद्रोही' है ! 'ब्रिटिश नेशनल अस्मेबली' में 'बम' और पर्चे फेंकते हुए और बादमें फाँसीके तख्तेसे भी शहीद भगतसिंह एवम उनके साथियों ने नारा लगाया था - 'इंकलाब जिंदाबाद'!मुकद्दमेंबाजी के दौरान  जब 'धर्म बनाम आस्था का सवाल उठा तो शहीद भगतसिंह ने बार-बार कहा 'हमारा मकसद मुल्क की आजादी और उसके पश्चात् सर्वहारा वोल्शेविक क्रांति है,धर्म मजहब के नजरिये से मैं नास्तिक हूँ '! नास्तिक शब्द को इतना सम्मान दुनिया में  कभी कहीं नही मिला।

आजादी के बाद भारत के दक्षिणपंथी धर्मभीरु 'हिंदुत्ववादी' लोग  यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि भगतसिंह और उनके साथी वामपंथी' विचारधारा के थे और अपने आपको 'बोल्शेविक' कहते थे ! उन्होंने पूरी शिद्दत से अपने आपको नास्तिक घोषित कियाथा। आजादी के बाद जिनकी रगों में अंगेजों के डीएनए का असर बाकी है, वे लोग 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारेको ही पसन्द नहीं करते। वे भगतसिंह की प्रतिमा पर एक आस्तिक की तरह माल्यार्पण तो करेंगे, किन्तु वे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि भगतसिंह 'नास्तिक' थे और वामपंथी कम्युनिस्ट भी थे ! चूँकि इन अमर शहीदों की आराध्य 'भारत माता' थी और उसकी आजादीके लिए उनका त्याग- बलिदान तपस्या थी ,इसलिए वे 'नास्तिक' होते हुए भी राष्ट्रके आराध्य हो गए ! इसी तरह आधुनिक कम्युनिस्टों और वामपंथियों का 'इष्ट' है -सर्वहारा वर्ग को शोषण -उत्पीड़न मुक्त करके एक बेहतर समाज व्यवस्था कायम करना। इसके निमित्त वे जो -जो जन संघर्ष या जनांदोलन करते हैं वह उनकी साधना या तपस्या है। इस महान उद्देश्यमें अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक होगा ,यदि  वाकई में उसका अस्तित्व है तो !

भारत ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में पतित व्यक्तियों और 'दवंग' समाजों द्वारा यह कुप्रचारित किया जाता रहा है कि कम्युनिस्ट तो नास्तिक होते हैं। पूँजीपतियों के दलाल  सत्ता में बने रहने के लिए बुर्जुवा धर्मभीरुता का स्वांग रचते रहते हैं। वे लोकतंत्र में चुनावी जीत के लिए, राजनीति में धर्म-मजहबका इस्तेमाल करते रहते हैं ! बुर्जुवा वर्ग की इस कारस्तानी में सहयोग के लिए कुछ हद तक वे भी जिम्मेदार हैं जो अपने आपको वामपंथी कहते हैं। वे धर्म-दर्शन और अध्यात्म का ककहरा भी नहीं जानते और तर्कवादी -भौतिकवादी प्रगतिशील बुद्धिजीवी बन बैठे हैं। तार्किकता,वैज्ञानिकता और मार्क्सवादी द्वंदात्मक भौतिकवाद तो मानवता के लिए बेहतरीन वरदान है। किन्तु कुछ 'प्रगतिशील' लोग अपनी विद्वत्ता प्रदर्शन के बहाने धर्म-मजहब -अध्यात्म के मसलों में नाहक अपनी डेढ़ टाँग घुसेड़ते रहते हैं। वे धर्म-मजहब का अनावश्यक मजाक उड़ाते रहते हैं। उनकी इस नादानी से दुष्ट -  साम्प्रदायिक तत्वों को ताकत मिलती है। और 'धर्मभीरु' जनता 'नास्तिक' क्रांतिकारियों की बनिस्पत पाखण्डी 'आस्तिक' साम्प्रदायिक तत्वों को भरपूर समर्थन तथा वोट देती रहती है।

'नास्तिकता' के नाम पर कम्युनिज्म को बदनाम करने वालों को राजनीति में इसलिए बढ़त हासिल है, क्योंकि  भारतकी अधिकांस गरीब जनता अशिक्षित है। आम आदमीको 'धर्म' की 'अफीम' पसन्द है। जनता इस मजहबी अफीम को दुखोंका निवारणकर्ता मानती है। धर्मभीरु जनता को आसानी से  'हिंदुत्व' ईसाइयत अथवा इस्लाम के नाम पर आसानी से ध्रुवीकृत किया जा सकता है। धर्म-मजहब  के ठेकेदार-स्वामियों,बाबाओं , पूँजीपतियों और उनके दलालों ने गठजोड़ करके न केवल कांग्रेस को बल्कि सम्पूर्ण वामपंथी बिरादरी को हासिये पर धकेल दिया है।  जिस देशके घर-घरमें नित्य शंख -घण्टानाद होता हो ,नमाज -ताजियोंके बहाने सड़कों पर क्रूर शक्ति प्रदर्शन होता  हो ,उसदेश की धर्मभीरु जनताको क्या गरज पडी कि किसी बाबा -स्वामी ,मुल्ला -मौलवी और सरकार से पन्गा ले ? इस मानसिकता की वजह से ही न केवल बंगाल में बल्कि सम्पूर्ण भारतमें संघर्षशील सर्वहारा का मेयार सिकुड़ता ही जा रहा है।इसके लिए वामपंथ द्वारा और खास तौर से प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का धर्म-मजहब पर  अतार्किक कटाक्ष और 'नास्तिकता' का ढोंग जिम्मेदार है !

 देश के मेहनतकशों-किसानों,कर्मचारियों और छात्रों के संघर्षों ,जनआन्दोलनों से वामपंथ की ज्यों ही कुछ ताकत बढ़ती है, त्योंही कुछ  स्वयमभू  वामपंथी नेता ,  प्रगतिशील बुद्धिजीवी उस धर्मनिपेक्ष ताकत रुपी शुद्ध दूधमें 'नास्तिकता' का नीबू निचोड़ देते हैं। उनके  प्रमाद से-  भृष्ट ,बेईमान शोषणकारी जातिवादी,सम्प्रदायवादी, पूँजीवादी और क्षेत्रीय दलों को विजयश्री मिल जाया करती है। इस तरह धर्म -मजहब के नाम पर जनता बार-बार ठगी जाती है। संकीर्णतावादी -कठमुल्लावादी लोग सिर्फ धर्म-मजहब की कतारों में ही नहीं हैं बल्कि वे वामपंथ और 'कम्युनिस्ज्म' की कतारोंमें भी हैं। ऐंसे लोग जनताके सवालों और आर्थिक-सामाजिक मुद्दों पर अच्छी पकड़ रखते हैं ,किन्तु  धर्म -मजहब के मामलों में वे अतीत के'नास्तिकवादी ' खूँटे से बंधे हुए हैं। इस २१वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भी वे  १८वीं सदी के पाश्चात्य सिद्धांतों से  चिपके हुए हैं।

 जो प्रगतिशील विचारक या अध्येता, अरब-यूरोप के मजहब-रिलिजन शब्द का अनुवाद संस्कृत के 'धर्म' में देखते हैं, वे  फ़्रांस,जर्मनी,चीन ,क्यूबा , लातिनी अमेरिकी- सुशिक्षित मेहनतकश आवाम और भारतकी अशिक्षित अपढ़ 'धर्मप्राण'जनता के  फर्क को नहीं समझते। सर्वहारा क्रांति की केवल एक ही ओषधि है।वोल्शेविक या माओवादी चिंतन। इस चिंतन और सोच से की ताकत से ही एक यूनिफार्म समाज में बदलाव या क्रांति को स्वीकृत किया जा सकता है। किन्तु जाति -धर्म के नाम पर बिखरे समाज और सदियों तक गुलाम रहे धर्मभीरु भारत के सर्वहारावर्ग से जब कोई कहता है कि कम्युनिस्ट तो  'नास्तिक' होते हैं ,तो हरावल दस्तोंका केडर भी उनका साथ छोड़ देता है। विगत १० सालों में  पश्चिम बंगाल में यही हुआ है। इसके लिए वे विचारक ,बुद्धिजीवी और चिंतक जिम्मेदार हैं जो अपने आपको बड़े से बड़ा कम्युनिस्ट मानते रहे हैं !

कुछ प्रगतिशील बुद्धिजीवी लेखक -विचारक -धरना आंदोलन और सड़कों का संघर्ष छोड़कर धर्म -मजहब के संवेदनशील विमर्श में अपनी टेडी टांग  घुसेड़ते रहते हैं। आमतौर पर आर्थिक- सामाजिक -राजनैतिक मसलों पर एक कम्युनिस्ट का अध्यन किसी पूँजीवादी अथवा साम्प्रदायिक नेता से  बेहतर होता है।क्योंकि उसकी सोच का वैज्ञानिक आधार होता है। किन्तु जब कभी धर्म-मजहबकी  चर्चा होती है, और यदि वह घोर नास्तिक बनने का ढोंग करता है तो जनता वह भी समझ  जाती है। दूसरी ओर भाववादी भृष्ट लोग भी  प्रचारित करते रहते हैं कि कम्युनिस्ट एवम प्रगतिशील खेमेंमें तो सब नास्तिक ही भरे पड़े हैं।जबकि तथाकथित आस्तिक लोगभी 'नास्तिक' के बारे में कुछ नहीं जानते। कुछ मूर्खोंने तो 'नास्तिक' चार्वाक दर्शन को  मार्क्सवाद से नथ्थी कर डाला है!

वस्तुतः वेदों को नहीं मानने वाला नास्तिक कहा जाता था वास्तव में 'नास्तिक'  वह नहीं जो अनीश्वरवादी है, बल्कि नास्तिक तो वह है जो बाप को बाप और माँ को माँ नहीं समझता। जो कृतघ्न- एहसान फरामोश और परजीवी है  जो समाज में घृणा फैलाता है ,जो जातिवाद की राजनीति करता है ,जो बेईमान है और अनैतिक कर्म करता हैमैं उसे नास्तिक कहता हूं । अपने विवेक ,साहस और परिश्रम से जीवन यापन करता है उसे किसी ईश्वर की वैसे ही जरूरत नहीं जैसे कि दहकते सूरज को किसी अन्य ऊर्जा स्त्रोत से तपन हासिल करने की आवश्यकता नहीं !

कौन आस्तिक है कौन नास्तिक है यह व्यक्तिगत सोच और आचरण का विषय है। कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति ,समाज ,राष्ट्र या विचारधारा के बारे में यह निर्णय नहीं कर सकता कि 'अमुक' व्यक्ति या अमुक विचारधारा वाले लोग नास्तिक हैं या अमुक व्यक्ति और अमुक विचाधारा के लोग आस्तिक हैं।
इस संदर्भ में संस्कृत सुभाषित बहुत प्रसिद्ध है :-
काक : कृष्ण पिक : कृष्ण , कोभेद पिक काकयो :!
वसन्त समय शब्दै : , काक: काक: पिक: पिक: ! !
इसका सुंदर अनुवाद स्वयम बिहारी कवि ने किया है :-
भले-बुरे सब एक से ,जब लों बोलत नाहिं।
जान परत हैं काक -पिक ,ऋतु वसन्त के माँहिं ।।
अर्थ :- अच्छा-बुरा ,आस्तिक -नास्तिक सब बराबर होते हैं ,जब तक वे अपने बचन और कर्म का प्रदर्शन नहीं करते। वसन्त के आगमन पर ही मालूम पड़ता है कि कोयल और कौआ में क्या फर्क है ?

यदि कोई कहे कि मैं 'नास्तिक' हूँ तो मान लो कि वो है,इसमें अपना क्या जाता है ? और यदि कोई कहे कि मैं तो 'आस्तिक' हूँ तो मान लो कि वो है,इससे तुम्हे क्या फर्क पड़ता है ? वैसे भी जो अपने आपको आस्तिक मानते हैं वे आसाराम,नित्यानंद और तमाम बाबा-बाबियां किस तरह के आस्तिक हैं यह सारा जगत जानता है। जबकि गैरी बाल्डी ,सिकंदर,जूलियस सीजर ,गेलिलियो ,अल्फ़्रेड नोबल ,आइजक न्यूटन डार्विन , रूसो,बाल्टेयर एडिसन,नेल्सन मंडेला ,मार्टिन लूथर किंग ,पेरियार, न्याम्चोमस्की जैसे लाखों नाम हैं जो अपने आपको नास्तिक मानते थे।
भारतीय हिन्दू दर्शन के अनुसार इस जीव जगत में ऐंसा कोई चेतन प्राणी नहीं जिसमें ईश्वर न हो !यह स्वयम भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है !
ईश्वरः सर्वभूतानाम ह्रदयेशे अर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन सर्वभूतानि ,यन्त्रारूढानि मायया।। ,,[गीता-अध्याय १८ -श्लोक ६१ ]
अर्थ :-हे अर्जुन ! शरीररूप यन्त्रमें आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी मायासे उनके कर्मानुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों में स्थित है। अर्थात ईश्वर सब में है। जो यह मान लेताहै वह आस्तिक है,जो न माने वो नास्तिक है। लेकिन नहीं मानने वाला जरुरी नहीं कि बुरा आदमी हो और मान लेने वाला जरुरी नहीं कि वह अच्छा आदमी ही होगा !वह रिश्वतखोर भी हो सकता है ,वह बदमाश -आसाराम जैसा लुच्चा भी हो सकता है !
जब कोई व्यक्ति कहे कि ''मैं नास्तिक हूँ '' तो उसे यह श्लोक पढ़ना होगा, यदि वह कुतर्क करे और कहे कि मुझे गीता और श्रीकृष्ण पर ही विश्वाश नहीं ,तो उसे याद रखना होगा कि श्रीकृष्ण ही दुनिया के सर्वप्रथम नास्तिक थे। उन्होंने ही 'वेद'विरुद्ध यज्ञ ठुकराकर सर्वप्रथम इंद्र की ऐंसी -तैसी की थी। गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा भले ही रूपक हो ,किन्तु उसी रूपक का कथन यह है कि श्रीकृष्ण ने ही सबसे पहले धर्म के आडम्बर-पाखण्ड को त्यागकर -गायों ,नदियों और पर्वतों को इज्जत दी थी। यदि कोई कम्युनिस्ट भी श्रीकृष्ण की तरह का 'नास्तिक ' है तो क्या बुराई है ?
मैं स्वयम न तो नास्तिक हूँ और न आस्तिक ,मुझे श्रीकृष्ण का गीता सन्देश कहीं से भी अवैज्ञानिक और असत्य नहीं लगा। लेकिन बुद्ध का वह बचन जल्दी समझ में गयाकि 'अप्प दीपो भव'' । बुद्ध कहा करते थे ईश्वर है या नहीं इस झमेले में मत पड़ो ''! कार्ल मार्क्स ने भी सिर्फ 'रिलिजन' को अफीम कहा है ,उन्होंने भी बुद्ध की तरह ईश्वर और आत्मा के बारे में कुछ नहीं कहा। मार्क्सने भारतीय दर्शन के खिलाफ भी कभी कुछ नहीं लिखा। बल्कि मार्क्सने वेदों की जमकर तारीफ की है। उन्होंने ऋग्वेद में आदिम साम्यवाद का दर्शन की खोज की है । उन्होंने ही सर्वप्रथम दुनिए को बताया था कि 'वैदिककाल में आदिम साम्यवादी व्यवस्था थी और उसमें वर्णभेद,आर्थिक असमानता नहीं थी '' तथाकथित आस्तिक हिन्दू [ब्राम्हण पुत्र भी ] वेदों के दो चार सूत्र और मन्त्र पढ़कर साम्प्रदायिकता की राजनीति करने लगते हैं। वे यदि आस्तिक वेदपाठी प्रकांड पण्डित न भी हो किन्तु इस श्लोक को तो याद कर ही ले।
''अन्यनयाश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषाम नित्याभियुक्तानां योगक्षेम वहाम्यहम।। '' [गीता अध्याय ९ श्लोक-२२]
श्रीराम तिवारी

भारत के अधिकान्स हिंदी भाषी लोग उर्दू के 'खिलाफत'शब्द का बेहद दुरूपयोग करते रहते हैं। दरसल इस 'खिलाफत' शब्द का वास्तविक अर्थ है 'इस्लामिक संसार के प्रमुख की सत्ता'! सार्वजानिक तौर पर भारतीय जन मानस द्वारा इस 'खिलाफत' शब्द का सबसे पहले प्रयोग १९१९ के खिलाफत आंदोलन के दौरान  किया गया था। तब इस शब्द को उसके सही अर्थ में प्रयोग किया गया था। किन्तु वर्तमान दौर में  'इस्लामिक दुनिया' का कोईभी व्यक्ति सत्ता के केंद्र में नहीं है अर्थात इस्लामिक'खलीफा' कोई नहीं है ,इसलिए दुनिया में 'खिलाफत' का भी कोई अस्तित्व ही नहीं है। फिर भी भाई लोग इस 'खिलाफत' शब्द की आये दिन ऐंसी -तैसी करते रहते हैं।अधिकांस जब पढ़े-लिख लोग इस शब्द को 'राजनैतिक विरोध ' या 'आलोचना' के पर्यायबाची रूप में इस्तेमाल करते हैं तो बड़ी कोफ़्त होती है। विरोध का वास्तविक उर्दू शब्द है 'मुखालफत' किन्तु इस शब्द को केवल वही इस्तेमाल करते हैं जो उर्दू जानते हैं।


जिस तरह अनाड़ियों नई खिलाफत शब्द की दुर्गति की है ,उसी तरह कुछ 'काम पढ़े लिखे 'लोगों ने संस्कृत के धर्म,अधर्म,आस्तिक,नास्तिक इत्यादि  शब्दोंका कबाड़ा कर डाला है। विद्वान् लोग जानते हैं कि संस्कृत के 'धर्म' शब्द का वास्तविक अर्थ रिलिजन या मजहब नहीं है। उसी तरह नास्तिक का सटीक अर्थ 'काफ़िर' अथवा  यथेस्ट [Atheist] नहीं है। इसलिए इस्लाम ,यहूदी या ईसाई मजहबों में 'संस्कृत के 'धर्म' अथवा  'नास्तिक' शब्द का कोई विकल्प नहीं है। यदि कोई शब्द पाया गया तो उसका अर्थ 'वेद विरुद्ध' वाली अवधारणा से बिलकुल पृथक होगा। भारतीय 'वैदिक वांग्मय' के अनुसार जो वेदविरुद्ध है वही नास्तिक है। इस सिद्धान्त के अनुसार सिर्फ भारतीय साँख्य ,न्याय,वैशेषिक इत्यादि दर्शन और जैन, बौद्ध ,सिख ,चार्वाक मतावलंबी को नास्तिक ही होना चाहिए। इस्लाम  ईसाई अथवा अन्य सेमेटिक मजहबों का इस शब से कोई सरोकार नहीं। भारत में चार्वाक मतावलम्बियों और अर्वाचीन साम्यवादियों ,समाजवादियों या रेशनलिस्टों के अलावा कोई भी अपने आपको नास्तिक नहीं मानता।

साम्यवादी दलों मेंभी सिर्फ उच्च शिक्षित नेतत्वकारी लोग ही दावा करते हैं कि वे 'नास्तिक' हैं। किन्तु वे नास्तिक शब्दको 'मार्क्सवाद' की वैज्ञानिक भौतिकवादी व्याख्या के 'अवैदिक' संदर्भ में देखते हैं। वास्तविक नास्तिक वेभी नहीं हैं। उनके नेतत्व में संगठित सर्वहारावर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा न तो आस्तिक है और न ही नास्तिक है। जो शख्स दो वक्त की रोटी की जुगाड़  में रात-दिन खेतों-कारखानों में पिस रहा हो ,जिसे किसी बाबा गुरु घण्टाल के क़दमों में शीश नवाने का अवसर ही न मिलता हो ,जो मंदिर -मस्जिद के अंदर ही न जा पाता हो ,उसे नास्तिक  कहो या आस्तिक कोई फर्क नहीं पड़ता।

जो जेब कतरे,लुच्चे -लफंगे गली मोहल्ले में मटकी फोड़ या होली की हुल्लड़ करते हैं ,भगवा - हरा दुपट्टा गले में बांधकर कोई गणेशोत्सव ,कोई करबला वाली छाती कूट रस्म ऐडा करता हो और बाद में रातको चेन स्नेचिंग और सट्टाखोरी ,जुआखोरी करते हों वे सिर्फ इसलिए आस्तिक नहीं हो जाते कि वे आसाराम जैसे बलातकारी की पैरवी करते हैं, मजहब के नाम पर 'जेहाद'की आग में जलते हैं। देश और दुनियाका  मेहनतकश मजदूर -किसान सिर्फ और सिर्फ 'सर्वहारा' है। उसे नास्तिक-आस्तिक शब्दों  की जरूरत ही नहीं है।

ऋगवेद के अस्ति -नास्ति प्रत्यय से उतपन्न आस्तिक एवम नास्तिक शब्दों का विस्तृत विमर्श संस्कृत वांगमय में और भारतीय प्राच्य 'दर्शन' में भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। उपनिष्दकाल में यह सिद्धांत प्रचलन में आया कि जो 'वेद' विरुद्ध है वह नास्तिक है।  ! नास्तिक -आस्तिक एक ही सिक्के के दो पहलु !
जब कोई व्यक्ति धर्म-मजहब ,आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी कपोलकल्पित साहित्य और 'ईश्वर'के अस्तित्व परआस्था -अंधश्रद्धा रखे,कोई सवाल नहीं करे- बल्कि धर्मगुरु और शास्त्र जो कहे उसे सत्य मानकर चले तो यह 'आस्तिक' का लक्षण है।जब कोई व्यक्ति कहे कि 'मैं जो कह रहा हूँ वही सत्य है' तो यह अभिमानी का लक्षण है !जब कोई व्यक्ति कहे कि 'दूसरों का अनिष्ट किये बिना ,किसी को हानि पहुंचाए बिना,तर्क की कसौटी पर जो सापेक्ष सत्य सिद्ध होगा-  मैं उसे ही स्वीकार करूँगा'  तो यह वैज्ञानिक का लक्षण है ! किसी को हानि पहुंचाए बिना,पाखण्ड और चमत्कार के झांसे में आये बिना जो व्यक्ति कहे कि 'मैं हमेशा न्याय का पक्षधर रहूँगा' तो यह 'स्वाभिमानी'का लक्षण है ! जो शख्श तर्कवादी, स्वाभिमानी ,विज्ञानवादी तथा  मानवतावादी होता है उसे ही 'नास्तिक' कहते हैं। जिस तरह यह सच है कि संसारके अधिकांस वैज्ञानिक अनुसन्धानकर्ता नास्तिक  थे। उसी तरह यह भी सच है कि संसार में सत्य ,अहिंसा,क्षमा ,नैतिकता, इंसानियत और तमाम मानवीय मूल्यों की स्थापना 'आस्तिक' मनुष्यों द्वारा की गई  है।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

हिंदी भाषी जनता रामेदव के पतंजलि उत्पादों की ग्राहक मात्र रह गयी है।

 जिन लोगों को बाबा रामदेव से योग सीखने और पतंजलि उत्पादों के सेवन से स्वष्थ जीवन जीने की प्रेरणा मिली उन्हें बधाई! लेकिन मैं बाबा रामदेव से अनेक मामलों में सहमत नहीं हूँ। बाबा रामदेव  एक 'आँख मारते' हुए जब दुरंगी राजनैतिक शब्दावली का प्रयोग करते हैं ,जब मोदी सरकार का बचाव करते हैं और जब विपक्ष की लानत-मलानत करते हैं तो उनका यह  कदाचरण महर्षि पतंजलिकी 'योगविद्या' से मेल नहीं खाता ! जहाँ तक रामदेवके द्वारा विश्वव्यापी 'योग' प्रचार का प्रश्न है तो इससे भारत के ५०% नंगे-भूंखे सर्वहारा वर्ग के लिए कोई मायने ही नहीं हैं।  व्यक्तिगत रूपसे मैं जन्मजात वंशानुगत योगी हूँ।मैंने रामदेव से कुछ नहीं  सीखा ,बल्कि  वंश परम्परा से ही उत्तराधिकार में मुझे राज योग ,सदाचार,और स्वाध्याय की शिक्षा दी गयी थी। हमें बचपन से ही घुट्टी पिलाई गयी कि 'नहीं ज्ञानेन सदृशं पवित्र महि विद्द्ते '! हमारे व्यक्तित्व निर्माण में स्वामी रामदेव का कोई अवदान नहीं है !किन्तु अब स्वामी रामदेव मुझे अच्छे लगने लगे हैं। क्योंकि उनका हृदय परिवर्तन होने लगा है ,उन्होंने आरबीआई के बहाने मोदी सरकार पर ही  निशाना साधा है कि नए नोट गलत नंबरिंग से छापे गए हैं और एक ही नंबर के डबल नोट करोड़ों में छाप डाले हैं। नोटबंदी में हड़बड़ी और हड़बड़ी में गड़बड़ी से मोदी सरकार के पसीने छूट रहे हैं !विपक्ष और कांग्रेस को तो संघ परिवार 'देशद्रोही' समझता है ,किन्तु चुनाव जिताऊ स्वामी रामदेव पर क्या आरोप लगाते हैं यह देखने की बात है ?

१७वीं -१८ वीं सदी के ध्वस्त भारत को गुलाम बनाते हुए, अंग्रजोंने अपने साम्राज्यवादी हितो को ध्यान में रखते हुए सर्वप्रथम मद्रास ,बंगाल,केरल,मुंबई ,दिल्ली ,देहरादून,चंडीगढ़ , पंजाब में 'मैकाले पध्दति' से शिक्षा प्रारम्भ की  थी। इसीलिये आजादी के बाद अधिकांस उच्चतर नौकरियां -पूर्वी,पष्चिमी और दक्षिण भारत के ही अंग्रेजीदां लोगों को  मिलती रहीं। कालांतर में नव आरक्षित  वर्ग भी इस अंग्रेजीदां नौकरशाही और राजनीतिक सत्ता का  हिस्सेदार हो गया। लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्र -यूपी ,बिहार,राजस्थान,मध्य भारत,बुन्देलखण्ड और विदर्भ इत्यादि की अधिकान्स जनता -आजादी के पहले वाली स्थिति से भी बदतर हालात में धकेल दी गयी। भारत का विशाल हिंदीभाषी भूभाग अपनी खनिजसम्पदा,वन सम्पदा और श्रम शक्ति तो देश को अर्पण करता रहा लेकिन  इस क्षेत्र की आबादी को शिक्षा,स्वास्थ्य ,रोजगार से महरूम रखते हुए या तो भगवान् भरोसे छोड़ दिया गयाअथवा विराट वोट बैंक बना दिया गया।

सामंतकालीन अथवा गुलाम उत्तर भारत में जो लोग वंशानुगत रूप से जल-जंगल और जमीनों पर काबिज थे, आजादीके बाद वही लोग राजनीति और नौकरशाही में घुस गए। आजादी के तुरन्त बाद के बिन्ध्यप्रदेश,मालवा , महाकौशल और बाद के मध्यप्रदेश, छग ,बुन्देलखण्ड और विदर्भ के शासन-प्रशासन में अधिकांस नौकरियों में पंजाबी,मराठी ,मुस्लिम ,सिंधी,बंगाली,मलयाली,तमिल और तेलगु वाले ही थे। उत्तर भारत के हिन्दीभाषी  हिन्दू और खास तौर से अधिकान्स ब्राह्मण परिवारों में श्रीमदभगवदगीता ,दुर्गासप्तशती ,वेद,उपनिषद, रामायण,विवाह पद्धति,अष्टाध्यायी,भागवतपुराण और पतंजलि योगसूत्र जैसी कुछ फटी-पुरानी पुस्तकों को पढ़ने पढ़ाने का चलन था। आजीविका का परंपरागत साधन छीज रहा था और उसके अलावा कोई अन्य विकल्प था ही नहीं। फिर भी वे इस संस्कृत वाङ्ग्मय को छाती से लगाए हुए थे। बीस साल पहले जब 'पतंजलि' आर्थिक साम्राज्य के स्वामी बाबा रामदेव इस हिंदी पूण्य धरा पर प्रकट भये याने  'अवतरित' हुए तो उन्होंने   बेचारे हिंदी भाषियों को ही अपना पहला शिकार बनाया। इससे उनका आर्थिक साम्राज्य तो खूब फला -फूला किन्तु हिंदी भाषी जनता रामेदव के पतंजलि उत्पादों की ग्राहक मात्र रह गयी है। उनके आर्थिक साम्राज्य की अधिकांस नौकरियां भी जाने कहाँ बिल गयीं हैं ? इसलिए उनके तथाकथित आयुर्वेदिक उत्पादों पर मैंने कभी यकीन नहीं किया।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016



'मैं' जो कह रहा हूँ  वही सत्य है ,यह अभिमानी का लक्षण है ! जो सत्य होगा उसे 'मैं 'सहर्ष स्वीकार करूँगा ,यह ज्ञानी का लक्षण है !  दूसरों का अनिष्ट किये बिना ,किसी को हानि पहुंचाए बिना 'मैं' हमेशा न्याय का पक्षधर रहूँगा यह 'स्वाभिमानी'का लक्षण है ! महर्षि आर बी बाँके

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

अम्बानी,अडानी,अड़िया,और रोहतगी जैसों की सलाह मानकर चायवाले 'भाईजी' जाने कब अर्थशास्त्री हो गए?लेकिन उन्होंने  विमुद्रीकरण सहित उदारीकरण का जो अर्थशास्त्र देश पर थोप दिया है ,वह शिंजो आबे ,पुतिन और 'बराक भाई' भी शायद पसन्द न करे! काश उन्होंने अपने 'आम आदमी' वाले व्यक्तित्व का ख़ास पूँजीवादी कायाल्पकरण करने से पहले कविवर रहीम का यह दोहा पढ़ लिया होता !

''रहिमन देख बडेन को ,लघु न दीजिये डार।

 जहाँ काम आवे सुई , कहा  करे  तलवार।।''


मोदी जी और उनकी टीम से यह उम्मीद नहीं कि वे दास केपिटल या 'वेल्थ ऑफ़ नेशन्स' पढ़ें ! वे चाणक्य का अर्थशास्त्र पढ़ें ,इसकी भी उम्मीद नहीं ! किन्तु वे गोस्वामी तुलसीदास रचित 'रामचरित मानस' के सिर्फ दो दोहे भी ठीक से पढ़ लें तो वे या तो राजनीती छोड़ देंगे या पूंजीवादी 'नीतियाँ ' बदल डालेंगे !

[१]-दंड जतिन कर  भेद जहँ ,नर्तक नृत्य समाज।

    जितहु मनहिं अस सुनिय जग ,रामचन्द्र के राज।। [उत्तरकांड]

[२]- बिधु महि पूर मयूखन्हि ,रवि तप जितनेहु काज।

        मांगे बारिद  देहिं  जल , रामचन्द्र  के  राज।।  [उत्तरकांड]

रविवार, 27 नवंबर 2016

संघर्षमें शामिल सभी साथियोंको -नमन

''भारत बन्द'' तो विगत ८ नवम्बर से ही जारी है। आज २८ नवम्बर को तो केवल 'जबरा मारे और रोने न दे '' वाली  कहावत ही  चरितार्थ हो रही है। कालेधन वाले हरामखोर बदमाश -तक्षक नाग अपने बिलों में छुपकर काले को सफ़ेद कर चुके हैं। चूँकि उनकी बीसों घी में हैं इसलिए भारत बन्द विरोध कर रहे हैं। नोटबंदी का समर्थन करने यदि उन घरों में जाएंगे जहाँ नोटबंदी के कारण मौतें हुईं हैं, तो शायद उनकी आत्मा में इंसानियत जाग उठेगी।  

  जिनके पास संपत्ति के रूप में केवल अपना खून-पसीना है ,जो मेहनतकश नर-नारी गरीबी में भी अपना ईमान नहीं छोड़ते ,जो किसी भी तरह के अन्याय को सहन नहीं करते , जो सच्चे देशभक्त हैं ,जो शासकों की सनक को देश के लिए खतरा मानते हैं, जिन्हें लगता है कि नोटबंदी के कारण कालाधन सरकार के हाथ नहीं आया, किन्तु ईमानदार जनता अवश्य परेशान हो रही है, ऐंसे जावाँज देशभक्त लोग आज  'विमुद्रीकरण 'की खामियों का और उसकेलिए जिम्मेदार नेता का पुरजोर विरोध कर रहे हैं ! इस संघर्षमें शामिल सभी साथियोंको -नमन !श्रीराम !  

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

संसद की अवमानना करने वालों को बेनकाब किया जाए !


 प्रगतिशील विचारकों - दार्शनिक सिद्धान्तकारों के अनुसार 'व्यक्ति -विशेष' की बनिस्पत ' विचार विशेष ' की महत्ता ही श्रेष्ठ है। इतिहास गवाह है जब-जब किसी 'व्यक्ति विशेष' को समाज या राष्ट्र से ऊपर माना गया, तब-तब मानव समाज ने बहुत धोखा खाया है। किसी 'व्यक्ति विशेष' के पक्ष -विपक्ष के कारण ही दुनिया में दो बड़े महायुद्ध हो चुके हैं।  भारत जैसे देश को तो इसी व्यक्ति केंद्रित सोच के कारण सदियों की गुलामी भोगनी पड़ी !दुनिया की जिस किसी कौम ने ,राष्ट्र ने, 'विचारधारा की जगह किसी व्यक्ति विशेष' को 'अवतार' या 'हीरो' माना  उस देश और समाज की बहुत दुर्गति हुई है।

जिस किसी प्रबुद्ध कौम या राष्ट्र ने 'व्यक्ति विशेष' की महत्ता के बजाय उसके द्वारा प्रणीत श्रेष्ठ 'मानवीय मूल्यों' को अर्थात ''विचारों' को  महत्व दिया ,उस कौम या राष्ट्र ने अजेय शक्ति हासिल की। व्यक्ति की जगह मानवीय मूल्य , मानवोचित विचार और विवेक को महत्व देने के कारण ही अंग्रेज जाति ने सैकड़ों साल तक अधिकांस दुनिया पर राज किया है। जबकि अपने तानाशाह शासक नेपोलियन की जय- जयकार करने वाली फ़्रांसीसी जनता को एक अंग्रेज जनरल 'वेलिंग्टन' के सामने शर्मिंदा होना पड़ा। इसी तरह हिटलर की जयजयकार करने वाले जर्मनों की नयी पीढी को उनके पूर्वजों का अंतिम हश्र ,आज भी शर्मिंदा करता है। जनरल तोजो की हठधर्मिता के कारण ही हिरोशिमा और नागाशाकी का भयानक नर संहार हुआ था, जिसका नकारात्मक असर आजभी जापानकी जनता  पर देखा जा सकता है। जो कौम या राष्ट्र इतिहास से सबक नहीं सीखते उनका वजूद हमेशा खतरे में रहता है !

कल्पना कीजिये कि घोड़े के पैर में लोहे की नाल ठुकती देख ,मेंढक भी नाल ठुकवा ले तो क्या होगा ? नाई को हजामत बनाते देख कोई बंदर भी उस्तरा चलादे तो क्या होगा ? सोचिये कि यदि कोई भारतीय नेता आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ,किसी पूर्ववर्ती सामंतयुगीन तानाशाह या बीसवीं सदी के बदनाम 'डिक्टेटर' की नकल करने लगेगा तो क्या होगा ? सदन का नेता और देशका प्रधानमंत्री किसी प्रासंगिक एजेंडे पर संसद में बयान देने के बजाय उसी विषय पर कभी मथुरा ,कभी आगरा और कभी बठिंडा की आम सभा में भाषण देते रहेंगे तो यह सरासर लोकतंत्र का अपमान होगा  !निश्चय ही यह तुगलक बनने की अपवित्र चेष्टा कही जाएगी ! यदि संसद का अनादर होगा तो लोकतंत्र कैसे जीवित रह सकता है ? चूँकि समाजवाद के लक्ष्य की पूर्ती के लिए  लोकतंत्र रुपी धनुष और सर्वहारा वर्ग की एकजुटता का बाण जरूरी है इसलिए लोकतंत्र की सर्वोच्च शक्ति याने भारतीय संसद की गरिमा को अक्षुण बनाये रखना जरुरी है।  संसद की अवमानना करने वालों को बेनकाब किया जाए !

 चूँकि एनडीए सरकार की 'नोटबंदी' योजना का 'जापा' बिगड़ चुका है। विपक्ष को  इस पर 'भारत बंद' करने की कोई जरूरत नहीं है। देश की जनता खुद समझदार है और यदि उसे इस योजना से बाकई हैरानी -परेशानी है या कष्ट हुआ है तो वह ही खुद निपट लेगी। देशके राजनैतिक विपक्ष को इस नोटबंदी पर आइंदा ज्यादा ऊर्जा बर्बाद करने के जरूरत नहीं है। इसके बजाय एकजुट होकर ,प्रधानमंत्री द्वारा लगातार की जा रही संसद की अवमानना पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। इसके लिए 'बहरत बंद' नहीं बल्कि देशभर में एक दिनका सामूहिक उपवास या भूंख हड़ताल का सर्वसम्मत प्रोग्राम बनाना  चाहिए ! देश की आवाम को संसदीय लोकतंत्र के खतरों से अवगत  कराया जाना चाहिए। वेशक इस 'नोटबंदी' से लगभग सौ निर्दोष जाने गयीं हैं, किन्तु यह भी सच है कि आतंकवाद ,नक्सलवाद , कालेधन पर कुछ तो असर हुआ है। 'अच्छे दिनों' की आशा में देश की जनता तकलीफ  उठाकर भी इन तत्वों को निपटानेके मूडमें है। इसलिए नोटबंदी पर अब ज्यादा तरजीह देनेकी जरूरत नहीं है।  

हालाँकि यह खेदजनक है कि  भारत की अधिकांस जनता इन दिनों एक खास 'व्यक्ति' के भरोसे है। जैसे सिकंदर के आक्रमण के समय पौरुष के भरोसे रहे ,जैसे  मुहम्मद बिन कासिम के हमले के वक्त दाहिरसेन के भरोसे रहे जैसे मुहम्मद गौरी के हमले के समय पृथ्वीराज चौहान के भरोसे रहे ,जैसे बाबर के हमले के समय राणा सांगा के भरोसे रहे , जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी की तिजारत के समय सिराजुददौला -मीरकासिम के भरोसे रहे जैसे अंग्रेजों के आक्रमण के समय बहादुशाह जफर के भरोसे रहे ,वैसे ही इन दिनों भारत की आवाम का एक खास हिस्सा नरेद्र मोदी  के भरोसे है। तो दूसरा हिस्सा भी केवल उनकी आलोचना में ही व्यस्त है। नीतियों-कार्यक्रमों पर अभी बहुत कम बात हो रही है। श्रीराम तिवारी !

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

का वर्षा जब कृषि सुखाने। समय चुके पुनि का पछताने।। ''

नोटबंदी के कारण इतनी सारी मौतें हो जाने के बाद ,निरीह जनता की करोड़ों बेबस आँखों से गंगा-जमुना बह जाने के बाद , नोटबंदी योजना में लगातार संशोधन रुपी सैकड़ों थेगड़े लग जाने के बाद ,डॉ मनमोहनसिंह उर्फ़  'मौनी बाबा' अब जाकर राज्य सभा में बोले हैं ! जो व्यक्ति १० सालतक देश का प्रधानमंत्री रहा हो और जिसकी  रहस्यमय 'चुप्पी' के कारण जुमलेबाजों को सत्ता नसीब हुई हो, जो सन्सार के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में से एक हो , जो विश्वबैंक का डायरेक्टर और अंतर्राष्टीय मुद्राकोष का सलाहकार रहा हो -उसका इस तरह देर से मुखर होना किस काम का ?  गोस्वामी तुलसीदास जी बाबा शायद इन्ही के लिए कह गए हैं -'' का वर्षा जब कृषि सुखाने। समय चुके पुनि का पछताने।। ''  For more reading please visit on www.janwadi.blogspot.com

यदि आप दूसरों के सतत सहयोगी बने रहेंगे तो !


यदि आप  वरिष्ठजनों ,सुह्रदयजनों और अभिभावकों के प्रति कृतज्ञता भाव रखते हैं तो आप को नैसर्गिक रूप से तत्काल ख़ुशी प्राप्त होगी। ज्यों ही आप नकारात्मक विचार तरंगों को प्रतिबंधित करते हैं ,अपना मन अनावश्यक मुद्दोंसे हटाकर उसे प्रकृति दर्शन ,आत्मदर्शन की ओर ले जाते हैं ,अथवा किसी के हितका विचार धारण करते हैं, खुशी की लहर तुरन्त दौड़ी चली आती है। छोटे -छोटे बच्चों की किलकारियों ,सितारों से सजी चांदनी रात और किसी मनोअनुकूल स्वजन से सहज वार्तालाप निश्चय ही सतत ऊर्जावान बनाते हैं। यदि आप किसी भी कार्य को करने से पहले यह देख लें कि वह अनैतिक तो नहीं है ,वह किसी अन्य के अहित का कारण तो नहीं बनेगा और उसे करने से किसी का कुछ लाभ है या नहीं ,तभी आप उस कार्य को करें। अन्यथा 'उससे बेहतर तो 'अकर्म 'की स्थिति ही उचित है। इस तरह जब आप निर्भीक होकर ख़ुशीमन से कोई कार्य करते हैं तो आपको गुणात्मक रूप से अनन्य ख़ुशी मिलती है। यदि आप खुशमिजाज रहेंगे ,दूसरों के सतत सहयोगी बने रहेंगे तो स्वाभाविक रूप से सर्वप्रिय बने रहेंगे। इस तरह आप अपने मन को  स्थिर करने में भी सफल हो सकते हैं,जो विपश्यना ,ध्यान और योग इत्यादि में मददगार सावित होगा। खुशमिजाज व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवनमें तो सफल होता ही है,किन्तु उसका सार्वजनिक जीवन भी भव्य और खुशहाल हो जाता है। वह दुःख ,क्लेश और अभाव में प्रशांतचित्त होकर चुनौतियों का सामना करता है। ऐंसा व्यक्ति भले ही अनीश्वरवादी ही क्यों न हो वह भौतिक,आध्यात्मिक और सर्व - सामाजिक  जीवन भी अक्षुण बनाता हैं । श्रीराम तिवारी !

रविवार, 20 नवंबर 2016


 इंदौर से हर सोमवार को निकलने वाला 'सकारात्मक सोमवार' का आज २१ नवम्बर [सोमवार] का अंक सामने है। इसका प्रथम पृष्ठ पूरा पढ़ने का माद्दा मुझमे नहीं है। जिसमे पूरा पेज पढ़ने की हिम्मत हो वह बड़ा जिगरवाला है  ! पुखरायाँ के समीप हुई भीषण रेल दुर्घटना की मार्मिक रिपोर्ट में उसका  सचित्र वर्णन, १०० से ऊपर दर्दनाक मौतें, सैकड़ों मरणासन्न - घायल , दर्दनाक चीख पुकार इसमें सब कुछ नकारात्मक और मर्मान्तक है ! हे नरेंद्र !हे प्रभु  ! इस देश पर रहम करो !

 इधर भारत के सत्ताधारी नेता जुमलेबाजी में ,जनता को परेशान करने या भरमाने की जद्दोजहद में जुटे हैं ,उधर   तुर्की का राष्ट्रपति एर्दोगान पाकिस्तान आया और पाकिस्तानी संसद में भाषण देकर चला गया। इस भाषण में एर्दोगान ने कश्मीर के सन्दर्भ में पाकिस्तान की कारिस्तानी का समर्थन किया है और भारत के हितों पर खुल्लम -खुल्ला चोट की है ,भारत के नकली 'राष्ट्रवादी' नेता ,उनके 'चारण - भाट और लोभी लालची स्वामी -बाबा लोग केवल विपक्ष को गरियाने में  जुटे हैं !

शनिवार, 19 नवंबर 2016


नोटबंदी अथवा सरकार के किसी अन्य नीतिगत फैसले से यदि जनता को या बैंक वालों को कोई तकलीफ होती है ,यदि लोग  मरने लगते हैं तो इसमें सरकार का कोई असुर नहीं। धार्मिक व्याख्या के अनुसार सभी प्राणी अपने -अपने किये का फल भोग रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी भी अपने रामचरितमानस में यही  कह गए हैं:-

''कोउ न काउ सुख दुखकर दाता। निजकृत कर्म भोग सब भ्राता।।

======++++++=====++++++=====+====

मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक याने नोटबंदी के इस 'महायज्ञ' में जो लोग स्वाहा हो रहे हैं, वे जब तक कतार में खड़े थे तब तक देशभक्त थे [राम माधव और राजनाथसिंह के अनुसार] जब ये देशभक्त कतार में खड़े -खड़े मर गए तो सत्ताधारी लोग इन दिवंगतों को शहीद  मानने से इनकार कर रहे है। नेता और मंत्री इन मौतों पर व्यंगात्मक टिपण्णी करे रहे हैं कि जनता को कोई परेशानी नहीं ! क्या यही लोकतंत्र है ? क्या  यही इंसानियत है ?

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

सरकार ने होम वर्क नहीं किया !


केंद्र सरकार की 'नोटबंदी' योजना से आरबीआई के पास अरबों रूपये पुराने नोटों की शक्ल में जमा हो चुके हैं !इस योजना के लागु होने से सरकार के खजाने में जमा हुई करेंसी में कितना कालाधन जमा हुआ यह तो सरकार ही जाने ,किन्तु इस आपाधापी में जो सैकड़ों जाने गईं हैं, उनमें  कालेधन वाला 'देशद्रोही' शायद एकभी नहीं था।   मोदी जी को मालूम हो कि उनकी इस नोटबंदी से एक नया आपराधिक समाज पैदा हो गया है। कमीशनखोर नए दलाल-भृष्ट बैंक कर्मचारी -अधिकारी और 'अदृष्यजगत' के बेईमानों ने आपण कालाधन सुरक्षित कर लिया है।   ईमानदार और बेकसूर लोग सरकार कीआधी अधूरी तैयारी और 'कुनीति' के कारण लाइन में लगे-लगे मरे हैं या मर रहे हैं। क्या उन्हें 'शहीद' का  दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए ? क्या उन्हें मरणोपरान्त वही सम्मान नहीं मिलना चाहिए जो देश के लिए जान देनेवालों को दिया जाता है?

सरकार और उसके चाटुकारों का ढपोरशंखी रवैया न जाने कितनी और जाने लेगा ? सरकार ने अपनी नोटबंदी पर इतने तदर्थ पैबन्द याने थेगड़े लगाये कि आज कोलकाता उच्च न्यायालय को भी कहना पड़ा कि '' सरकार ने होम वर्क नहीं किया'' । केवल ढींगे हाँकने या कोरी लाठी पीटने से साँप नहीं मरते। अभी तक एक भी कालेधन वाला मगरमच्छ तो क्या छटाक भर की मछली भी नहीं पकड़ सके हैं । बड़े आश्चर्य की बात है कि नोटबंदी बनाम 'मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक' पर सरकार और उसके 'चमचों' को बिखरे हुए विपक्ष का भौंथरा विरोध भी सहन नहीं हो रहा है। यदि इस नोटबंदी  का मकसद कश्मीरी पत्थरबाजों को नसीहत देना था तो पूरे देश को दाँव पर क्यों  लगाया ?  यदि इस मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक का मकसद ,पाकिस्तान में छपने वाली नकली करेंसी को रोकना है तो यह बात तो सबको मालूम है कि पाकिस्तान की आईएसआई नकली भारतीय मुद्रा छापकर भारत में खपाती है , यह खबर पूरी दुनिया को वर्षों से मालूम है , क्या यह बात शरीफ के घर चाय पीते वक्त मोदी जी भूल गए थे ?

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

आप बेक़सूर लोगों की जान क्यों ले रहे हैं?


अभी -अभी श्रीमतीजी को अस्पताल ले गया ,वहाँ अधिकांस लोग इलाज के लिए रुपयों की मारामारी और पुराने नोटों को बदलने की परेशानी बयां  कर रहे थे।  मैंने भी अपना अनुभव बताया कि 'नोटबंदी' से मुझे तो कोई खास परेशानी नहीं हुई। लोगों ने आश्चर्य से मेरी और देखा और पूँछा  वो कैसे ? मैंने कहा कि मेरे पास काला और गोरा दोनों ही प्रकार का धन नहीं है। रही बात बैंक में जमा मामूली बचत खाते से निकासी की तो सीनियर सिटीजन्स   की हैसियत से जहाँ भी जाता हूँ ,एटीएम की लाइन वाले अपने आप रास्ता छोड़ देते हैं। यह सुनकर मेरे परिचित डॉक्टर ने सवाल किया कि फिर आप अपने ब्लॉग पर और फेसबुक पर मोदी जी की 'मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक' का विरोध क्यों करते हैं ?

मैंने उन्हें बताया कि यदि पड़ोस के मकान में आग लगी हो तो आप को चैन से सोने की मूर्खता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि वह मुसीबत की आग किसी को नहीं छोड़ती। रतलाम में जवान बेटा अपने बाप को लाइन में खड़ा कर आधार कार्ड लेंने घर गया, कार्ड खोजने और नहीं मिल पाने के कारण घबराहट से उसका हार्ट फ़ैल हो गया , पोस्ट मार्टम में डॉक्टरों ने बताया कि मृतक बंदा दो दिनों से भूंखा था। क्योंकि उसका गाँव रतलाम से बहुत दूर है और इधर बैंक में लाइन इतनी लम्बी कि उसका नम्बर आते -आते नोट खत्म हो जाते हैं । बेटे की मौत की खबर सुनकर बाप अभी तक सदमें में है।  यह एक घटना है ,इसी तरह भारत में अब तक लगभग ४४ लोग  इस नोटबंदी की भेंट चढ़ चुके हैं ! वेशक  इस नोटबंदी से मुझे कोई परेशानी नहीं है ! जबकि नक्सली और आतंकी बहुत परेशान हैं। हजार-हजार के नोटों की माला धारण करने वाली नेत्रियां और नेता भी परेशान हैं, किन्तु उन्हें छकाने के लिए आप बेक़सूर लोगों की जान क्यों ले रहे हैं ?  इसके अलावा ओएनजीसी को एक लाख करोड़ का चूना लगाने वाले अम्बानी ,बैंकों को चूना लगाने वाले विजय माल्या ,अरबों का हवाला -घोटाला करने वाले मित्रवर अडानी की काली सम्पदा को सफ़ेद कर चुकने  के बाद यह 'मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक' केवल प्रहसन बनकर रह गयी है। इसलिए इसके समर्थन या विरोध का बबाल खड़ा करने के बजाय जनता की परेशानी पर तुरन्त  ध्यान दिया जाना चाहिए ! श्रीराम तिवारी ! 

सोमवार, 14 नवंबर 2016

भरतखण्डे उर्फ़ जम्बूदीपे उर्फ़ आर्यावर्त उर्फ़ हिन्दुस्तान उर्फ़ इंडिया उर्फ़ भारतवर्ष में 'कालेधन' की वजह से  समुचित विकास नहीं हो पा रहा है।देश के दुश्मनों द्वारा नकली मुद्रा [कालाधन]छापकर भारत में आतंकवाद - अलगाववाद को बढ़ावा दिया जारहा हैऔर तमाम किस्मके आर्थिक संकट केलिए यह 'कालाधन'ही जिम्मेदार है।भारत के सत्तारूढ़ नेतत्व का दृढ़ विश्वास है कि हजार-पांच सौ की 'नोटबंदी' से सब कुछ ठीक हो जाएगा।  
'वेदांत दर्शन' के कार्यकरण -सिद्धांतानुसार  कालाधन 'कारण' है और नोटबंदी' कार्य है। और यह नोटबन्दी रुपी कार्य ही भारत में वर्तमान 'मुद्रा संकट' रुपी कार्य का कारण बन गया है। इस 'मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक' की कृपा से देश के निम्न मध्यम वर्ग का दिमाग चकरघिन्नी हो रहा है। देश में  करोड़ों ईमानदार लोग होंगे जिन्हें अभी तक 'नये नोटों ' के दर्शन भी नहीं हुए हैं ,किन्तु आज की ताजा खबर है कि तेलांगना में कुछ 'बदमाशों' को २००० रू० के नए 'नकली नोट' चलाते पकड़ा गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि अच्छे दिन आये हैं या कि देश में अघोषित आपातकाल चल रहा है !

गुरुवार, 10 नवंबर 2016


  प्रेसिडेंट पद पर डोनाल्ड ट्रम्प की जीत से  न केवल अमेरिका में बल्कि पूरी दुनिया में अचरज का माहौल  है। जिन लोगों ने हिलेरी की जीत  की भविष्यवाणी की थी और जिन्होंने  ट्रम्प को  'मसखरा' या   'लम्पट' कहा था वे अभी कोमा में हैं। वास्तविकता यह है कि साम्राज्यवादी मुल्क अमेरिका  पूरा का पूरा 'भाँग का कुआँ' ही है ,वहाँ कोई भी प्रेजिडेंट बने, लेकिन सत्ता केवल 'आवारा पूँजी' के निर्देशानुसार ही चलेगी ! अब रही बात तथाकथित सभ्य महिला हिलेरी क्लिंटन की दर्दनाक हार की ,तो पांच साल पहले इन्ही ट्रम्प महाशय ने कहा था ''अमेरिकी महा बेवकूफ होते हैं ''! श्रीराम तिवारी !

 इंदौर ,दिनांक १० नवम्बर -२०१६ ,दैनिक भास्कर की खबर है कि '' विगत आधी रात के बाद से सुबह ४ बजे तक  इंदौर में ५० हजार रुपया प्रति १० ग्राम के भाव से १०० किलो सोना खरीदा गया ! '' यह बताने की जरूरत नहीं कि खरीददार कौन थे ? इनमें से अधिकांस वे  लोग थे जो  कालेधन के मालिक हैं और दिन में अपने आपको 'राष्ट्रवादी' या  सेक्यूरिस्ट 'कहते हैं।  यदि अकेला इंदौर सराफा ही  मात्र तीन घण्टे में ५०० ००००००० /- करोड़ के  कालेधन को सफ़ेद में बदल सकता है,तो देश के अन्य शहरों -और कसवों का कुल योग कितना होगा ?  भारत के धर्मनिरपेक्ष ,ईमानदार और  लाइन में लगकर ,तकलीफ उठाकर २-४ हजार रूपये के लिए पसीना बहाने वाले नर-नारी  सवाल कर रहे हैं कि  प्रधानमंत्री मोदी जी  कहीं आपका यह मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक भी संदेहास्पद तो नहीं है ? और इसकी भी क्या  गारन्टी है कि  पाकिस्तान का एएसआई और आतंकी निजाम  आइंदा नकली नोट छापकर भारत भेजना बंद कर देगा ? जब व्हाइट कॉलर लोग नयी तकनीक ईजाद कर सकते हैं तो आतंकी  ऐंसा क्यों  नहीं कर सकते  ? श्रीराम तिवारी !
  

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ कल्पना का नाम 'ईश्वर 'है !

सैकड़ों साल पहले जब नीत्से ने कहा था कि ''ईश्वर मर चुका है '' तब  फेस बुक ,ट्विटर और वॉट्सअप नहीं थे , वरना साइंस पढ़े -लिखे और साइंस को ही आजीविका बना चुके धर्मांध सपोले उस 'नीत्से' को भी डसे बिना नहीं छोड़ते। आज चाहे  आईएसआईएस के खूंखार जेहादी हों ,चाहे पाकिस्तान प्रशिक्षित कश्मीरी आतंकी हों ,चाहे जैश ए मुहम्मद और सिमी के समर्थक हों या जिन्होंने दाभोलकर,पानसरे ,कलबुर्गी और अखलाख को मार डाला ऐंसे स्वयम्भू कट्ररपंथी हिंदुत्ववादी हों ये सबके सब 'नीत्से' की स्थापना के जीवन्त प्रमाण हैं।


मानव सभ्यता के इतिहास में बेहतरीन मनुष्यों द्वारा आहूत उच्चतर मानवीय मूल्यों को धारण करने की कला का नाम 'धर्म' है !मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ कल्पना का नाम 'ईश्वर' है। भारतीय वांग्मय के 'धर्म' शब्द का अर्थ 'मर्यादा को धारण करना' माना गया है। जबकि दुनिया की अन्य भाषाओं में 'मर्यादा को धारण करना'याने 'धर्म' शब्द का कोई वैकल्पिक शब्द ही नहीं है। जिस तरह मजहब ,रिलिजन  इत्यादि शब्दों का वास्तविक अर्थ या अनुवाद 'धर्म' नहीं है। उसी तरह 'परमात्मा या ईश्वर जैसे शब्दों का अभिप्राय भी अल्लाह  या गॉड कदापि नहीं है। कुरान के अनुसार 'अल्लाह' महान है और मुहम्मद साहब उसके रसूल हैं तथा अल्लाह ही कयामत के रोज सभी मृतकों के उनकी नेकी-बदी के अनुसार फैसले करता   है।इसी तरह  बाईबिल का 'गॉड ' भी अलग किस्म की थ्योरी के अनुसार पूरी दुनिया का निर्माण महज ६ दिनों में करता है और अपने 'पुत्र' ईसा को शक्ति प्रदान करता है की धरती के लोगों का उद्धार करे। जबकि गीता ,वेद और उपनिषद का कहना है की 'आत्मा ही परमात्मा है' ''तत स्वयं योग संसिद्धि कालेन आत्मनि विन्दति''या ''पूर्णमदः पूर्णमिदम ,पूर्णात पूर्णम उदचचते। पूर्णस्य पूर्णमादाय ,पूर्णम एवाविष्य्ते '' याने  प्रत्येक जीवात्मा का अंतिम लक्ष्य अपनी पूर्णता को प्राप्त करना है ,अर्थात परमात्मा में समाहित हो जाना है। इस उच्चतर दर्शन को श्रेष्ठतम मानवीय सामाजिक मूल्यों से संगति बिठाकर जो जीवन पद्धति बनाई गयी उसे 'सनातन धर्म' कहते हैं। कालांतर में स्वार्थी राजाओं ,लोभी बनियों और पाखण्डी पुरोहितों ने  अपने निजी स्वार्थ के लिए धर्मको शोषण-उत्पीड़न का साधन बना डाला। उन्होंने पवित इस धर्म को जात -पांत ,ऊंच -नीच घृणा ,अहंकार और अनीति का भयानक कॉकटेल बना डाला जिसे सभी लोग अब 'अधर्म' कहते हैं। इस अधर्म में जब अंधराष्ट्रवाद और धर्मान्धता का बोलवाला हो  गया तब   कार्ल मार्क्स ने उसे अफीम कहा था । धर्म-मजहब की यह अफीम इन दिनों  पूरी दुनिया में इफरात से मुफ्त में मिल रही है।  श्रीराम तिवारी !


रविवार, 23 अक्टूबर 2016

खबर है की प्रधानमंत्री श्री मोदीजी ने कालेधन वालोंको अभी तक दी जा रही ४५% हर्जाने के साथ कालाधन- सफ़ेद करने वाली स्कीम  बन्द करने का निश्चय किया है। उन्होंने आइंदा कालेधन वालों के खिलाफ 'सर्जिकल स्ट्राइक 'का मंसूबा तय किया है। यदि वे इसमें कामयाब होते हैं तो यह बाकई भारतीय इतिहास में 'पहली बार' होगा। बड़े-बड़े भृस्टाचारियों पर अंकुश लगेगा तो चिन्दीचोर- रिश्वतखोर भी अपने आप लाइन पर आ जायेंगे। इससे देश का खजाना भरेगा और कुछ हद तक देश की जनता को भी 'सुशासन और विकास' का लाभ मिलेगा। तब शायद कुछ 'अच्छे दिन ' भी आ सकते हैं। मोदी जी को भी 'जुमलेबाजी' के आरोप से मुक्ति मिल सकती है। लेकिन यह सब तभी सम्भव है जब वे यह करके दिखाएँ। वरना तो  बिहार के चुनाव में भी 'सवा लाख करोड़' घोषित करके वे शायद भूल चुके हैं।